अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने वीजा नियमों में बदलाव को प्रशासनिक सुधार बताया है, लेकिन भारतीय IT सेक्टर पर इसका गहरा असर पड़ने वाला है। नए नियमों, भारी फीस और वीजा रिन्यूअल में आ रही दिक्कतों से भारतीय कंपनियों के मुनाफे और प्रोजेक्ट टाइमलाइन पर दबाव की आशंका बढ़ गई है।
अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने स्पष्ट किया है कि ट्रंप प्रशासन द्वारा लाए गए नए वीजा नियम किसी खास देश को निशाना बनाने के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक प्रशासनिक कमियों को दूर करने के लिए हैं। हालांकि, ये बदलाव उन भारतीय IT कंपनियों के लिए सीधी चुनौती बन गए हैं, जो H-1B वीजा पर बड़े पैमाने पर निर्भर हैं। प्रशासन का दावा है कि ये कदम सिस्टम के दुरुपयोग को रोकने के लिए हैं, लेकिन भारतीय कॉरपोरेट्स के लिए यह वित्तीय और ऑपरेशनल अनिश्चितता लेकर आए हैं।
वीजा नियमों में बदलाव और बढ़ती लागत
भारतीय IT कंपनियों के लिए सबसे बड़ा झटका 'वीजा रिन्यूअल डिफरेंस' (renewal deference) पॉलिसी का खत्म होना है। पहले अमेरिका में काम कर रहे प्रोफेशनल्स के लिए रिन्यूअल प्रक्रिया काफी आसान थी, लेकिन अब हर एक्सटेंशन के लिए कड़े रिव्यू से गुजरना होगा, जिससे प्रोजेक्ट्स में स्टाफ की निरंतरता पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, कुछ कैटेगरी में $100,000 की भारी फाइलिंग फीस और सितंबर 2027 तक के लिए वीजा सस्पेंशन भारतीय कंपनियों के लिए बड़ा वित्तीय बोझ साबित हो रहे हैं।
मार्जिन और टैलेंट रणनीति पर असर
प्रशासन ने अब 'वेज-वेटेड लॉटरी सिस्टम' (wage-weighted lottery) भी लागू किया है, जिससे कंपनियों को वीजा हासिल करने के लिए वेतन बढ़ाना पड़ सकता है। इसके साथ ही, हाल ही में छंटनी करने वाली कंपनियों पर कड़ी निगरानी के आदेश से भर्ती प्रक्रिया और जटिल हो गई है। अब निवेशक इस बात पर नजर रखे हुए हैं कि क्या ये कंपनियां बढ़ा हुआ खर्च अपने क्लाइंट्स पर डाल पाएंगी या फिर आने वाली तिमाहियों में उनके मुनाफे (Margin) पर इसका बुरा असर पड़ेगा। भारतीय IT कंपनियों के लिए अब विदेशी मॉडल से हटकर अमेरिकी बाजार में स्थानीय कर्मचारियों को रखने की मजबूरी बढ़ती जा रही है, जो भविष्य में उनके कॉस्ट स्ट्रक्चर को पूरी तरह बदल सकता है।
