अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड बढ़कर **5.14%** के स्तर पर पहुंच गई है। निवेशकों का पैसा बॉन्ड से निकलकर टेक स्टॉक्स की ओर शिफ्ट हो रहा है, जबकि क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतें और कॉरपोरेट डेट सप्लाई ने बाजार की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
बॉन्ड यील्ड में क्यों आई तेजी?
सोमवार को अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड ने 5.14% का आंकड़ा छू लिया। इस तेजी की मुख्य वजह टेक्नोलॉजी सेक्टर में आया उछाल है। निवेशकों का भरोसा वापस लौटने से Nasdaq 100 Index में 1.2% की बढ़त दर्ज की गई, जिसके चलते पैसा सुरक्षित माने जाने वाले बॉन्ड्स से निकलकर इक्विटी मार्केट की तरफ मुड़ गया है।
इन्फ्लेशन और एनर्जी का दबाव
बॉन्ड बाजार में बिकवाली की एक बड़ी वजह क्रूड ऑयल है। WTI Crude Oil फ्यूचर्स में 2.2% का इजाफा हुआ है, जो एक महीने के उच्चतम स्तर पर है। बढ़ती एनर्जी कीमतें महंगाई की आहट देती हैं, जो बॉन्ड होल्डर्स के लिए अच्छी खबर नहीं है। UBS के स्ट्रैटेजिस्ट्स ने अब 10-वर्षीय यील्ड का ईयर-एंड टारगेट बढ़ाकर 5.2% कर दिया है, जिसकी वजह फेडरल रिजर्व का सख्त रुख और तेल की बढ़ती कीमतें हैं।
कॉरपोरेट डेट और ग्लोबल अस्थिरता
बाजार पर नया डेट आने का भी दबाव है। Walmart और Kimberly-Clark जैसी बड़ी कंपनियों द्वारा भारी मात्रा में बॉन्ड जारी करने से सप्लाई बढ़ गई है। वहीं यूरोप में फ्रांस के सॉवरेन डेट का हाल भी बेहाल है, जहां 10-वर्षीय नोट की यील्ड 4.95% तक पहुंच गई है, जो 2002 के बाद का उच्चतम स्तर है।
भारतीय निवेशकों के लिए संकेत
भारतीय बाजार के लिए यह डेवलपमेंट काफी अहम है। जब अमेरिकी यील्ड बढ़ती है, तो ग्लोबल निवेशकों के लिए 'रिस्क-फ्री' रिटर्न बढ़ जाता है। इससे भारत जैसे उभरते बाजारों से FII (फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स) की निकासी बढ़ सकती है, जो घरेलू मार्केट में उतार-चढ़ाव लाती है। इसके अलावा, क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतें भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट पर दबाव डालती हैं और रुपये को कमजोर करती हैं। निवेशकों को अब अमेरिकी महंगाई के आंकड़ों और तेल की कीमतों पर कड़ी नजर रखनी चाहिए।
