US 10-year Treasury yields बढ़कर **4.81%** के करीब पहुँच गए हैं, जो पिछले तीन सालों का उच्च स्तर है। AI इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए रिकॉर्ड कॉरपोरेट कर्ज और भारी सरकारी कर्ज इसके पीछे मुख्य वजहें हैं।
बाजार में मची हलचल
अमेरिका में कर्ज लेने की लागत ने एक बड़ा माइलस्टोन पार कर लिया है। 10-year U.S. Treasury yield का 4.81% पर पहुंचना इस बात का संकेत है कि अमेरिकी सरकार अपने बढ़ते घाटे—जो 2026 फाइनेंशियल ईयर तक $2 ट्रिलियन के करीब पहुंच सकता है—को मैनेज करने में संघर्ष कर रही है।
क्यों बढ़ रही है यील्ड? (Crowding Out Effect)
इस स्थिति के पीछे 'क्राउडिंग आउट' (Crowding Out) इफेक्ट है। बड़ी टेक कंपनियां AI इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए आक्रामक तरीके से कर्ज ले रही हैं। अनुमान है कि 2026 तक इनका खर्च $755 बिलियन तक पहुंच जाएगा। निवेशक सरकारी बॉन्ड के बजाय इन कंपनियों के कॉरपोरेट बॉन्ड को अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे सरकार को खरीदार जुटाने के लिए ऊंची ब्याज दरों (Yields) का लालच देना पड़ रहा है।
बाजार को संभालने की कोशिश
बाजार की इस अस्थिरता को कम करने के लिए, अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने 9 सितंबर, 2026 से लिक्विडिटी सपोर्ट बायबैक ऑपरेशन्स को बढ़ाने का ऐलान किया है। इसके तहत 10 से 30 साल की अवधि वाले सिक्योरिटीज के लिए हर ऑपरेशन में कम से कम $4 बिलियन के बायबैक किए जाएंगे, ताकि $40 ट्रिलियन के कर्ज के बोझ को संभाला जा सके।
भारतीय निवेशकों के लिए रिस्क
अमेरिकी यील्ड बढ़ने का सीधा असर भारत पर पड़ता है। जब अमेरिका में बिना रिस्क के रिटर्न बढ़ता है, तो विदेशी निवेशक (FPIs) भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट से पैसा निकालना शुरू कर सकते हैं। इसके अलावा, मजबूत डॉलर के चलते रुपया कमजोर हो सकता है, जिससे तेल जैसे इंपोर्ट्स महंगे हो जाते हैं और देश में महंगाई का खतरा बढ़ जाता है। RBI को अब अपनी पॉलिसी तय करते समय इन ग्लोबल फैक्टर्स पर बारीक नजर रखनी होगी।
