अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेस्सेंट के लॉन्ग-टर्म कर्ज की लागत घटाने के दांव ने उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। 10-Year Yields वापस 4.73% पर पहुँच गए हैं। भारी-भरकम **$40 ट्रिलियन** के राष्ट्रीय कर्ज और AI प्रोजेक्ट्स के लिए कंपनियों के भारी उधार ने इस प्लान को नाकाम किया। निवेशकों के लिए संकेत साफ हैं: ग्लोबल ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं, जिससे भारत जैसे उभरते बाजारों में लिक्विडिटी (तरलता) कम हो सकती है।
अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेस्सेंट की लॉन्ग-टर्म बॉरोइंग कॉस्ट (उधार लागत) कम करने की कोशिशें उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं दे पाईं। "ट्रेजरी ट्विस्ट" नाम की इस स्ट्रैटेजी में सरकार लॉन्ग-टर्म सरकारी बॉन्ड्स खरीदकर शॉर्ट-टर्म सिक्योरिटीज जारी कर रही थी, ताकि यील्ड कर्व (Yield Curve) को इस तरह मोड़ा जा सके कि लॉन्ग-टर्म उधार सस्ता हो जाए।
शुरुआत में यील्ड्स में कुछ गिरावट आई भी, लेकिन हफ्ते के अंत तक बेंचमार्क 10-Year Treasury Yield करीब 4.73% पर वापस चढ़ गया।
क्यों नाकाम हुआ प्लान?
इस विफलता से पता चलता है कि अमेरिकी सरकार को अपने $40 ट्रिलियन के विशाल कर्ज को संभालने में कितनी मुश्किलें आ रही हैं। बाजार के जानकारों का मानना है कि ट्रेजरी के इस टेक्निकल इंटरवेंशन (तकनीकी हस्तक्षेप) पर ज्यादा ध्यान देने के बजाय, बॉन्ड मार्केट में सप्लाई और डिमांड के फंडामेंटल इश्यूज हावी रहे। खासकर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) प्रोजेक्ट्स के लिए बड़ी टेक कंपनियों द्वारा भारी मात्रा में कॉर्पोरेट डेट (कॉर्पोरेट कर्ज) जारी करने से मार्केट में सप्लाई बढ़ी है, जिसने ब्याज दरों पर ऊपर की ओर दबाव बनाए रखा है।
भारत पर क्या होगा असर?
अमेरिकी बॉन्ड मार्केट की ये हलचलें भारत के निवेशकों के लिए अहम हैं। ग्लोबल बॉन्ड यील्ड्स "रिस्क-फ्री" रिटर्न के लिए बेंचमार्क का काम करते हैं। जब अमेरिकी यील्ड्स ऊंची बनी रहती हैं, तो भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट्स (उभरते बाजार) फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) के लिए कम आकर्षक हो जाते हैं। ऊंची अमेरिकी दरें अक्सर मजबूत डॉलर का कारण बनती हैं और इमर्जिंग मार्केट्स से पूंजी अमेरिका की ओर जा सकती है, जिससे भारत जैसे बाजारों में लिक्विडिटी (तरलता) और करेंसी की स्थिरता पर असर पड़ सकता है।
आगे क्या?
विश्लेषकों का कहना है कि बॉन्ड मार्केट में टेक्निकल उपाय तब तक कारगर नहीं होते जब तक कि फिस्कल सिचुएशन (राजकोषीय स्थिति), जैसे हाई बजट डेफिसिट (बजट घाटा) और लगातार महंगाई, पर ध्यान न दिया जाए। यह भी एक चिंता का विषय है कि ट्रेजरी के ये कदम फेडरल रिजर्व की मॉनेटरी पॉलिसी (मौद्रिक नीति) के साथ कैसे इंटरैक्ट करेंगे। अगर ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड्स को मैनेज करने में बहुत आक्रामक हो जाता है, तो सेंट्रल बैंक की आजादी पर सवाल उठ सकते हैं और ग्लोबल निवेशकों के लिए अनिश्चितता पैदा हो सकती है।
बाजार की निगाहें इस बात पर रहेंगी कि क्या ट्रेजरी अपने बाय-बैक ऑपरेशन्स (शेयर वापस खरीदने के अभियान) को बढ़ाता है, जैसा कि सेक्रेटरी बेस्सेंट ने पहले संकेत दिया था। निवेशकों के लिए सबसे अहम बात यह होगी कि 4.7% का मौजूदा यील्ड लेवल कितना टिकाऊ है। अगर इन कोशिशों के बावजूद यील्ड्स बढ़ती रहती हैं, तो यह बाजार को संकेत दे सकता है कि मौजूदा फिस्कल पाथ (राजकोषीय मार्ग) से लॉन्ग-टर्म इन्फ्लेशन एक्सपेक्टेशंस (मुद्रास्फीति की उम्मीदें) ऊंची बनी हुई हैं, जिससे कंपनियों और सरकारों को पूंजी के लिए लगातार ऊंची लागत चुकानी पड़ेगी।
