US Treasury Secretary Scott Bessent ने G20 देशों से चीनी सामानों पर ट्रेड बैरियर (trade barriers) लगाने का आग्रह किया है। उनका तर्क है कि अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ के कारण सस्ते चीनी उत्पाद अब अन्य बाजारों में डंप किए जा रहे हैं, जो स्थानीय उद्योगों के लिए बड़ा खतरा हैं। यह कदम फरवरी 2026 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बाद आया है, जिसमें सरकार की आयात शुल्क लगाने की शक्तियों को सीमित कर दिया गया था।
ग्लोबल ट्रेड का नया समीकरण
नॉर्थ कैरोलिना में आयोजित G20 समिट के दौरान, अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी Scott Bessent ने वैश्विक वित्त मंत्रियों के सामने चिंता जाहिर की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि अगर अन्य देश अभी नहीं जागे, तो चीनी प्रोडक्ट्स की बाढ़ उनके घरेलू मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और रोजगार को भारी नुकसान पहुंचा सकती है।
क्यों है यह इतना जरूरी?
अमेरिका की चिंता के पीछे 2025 का $1.2 ट्रिलियन का विशाल ट्रेड सरप्लस है। Bessent का मानना है कि चीन अपनी घरेलू मांग की कमजोरी को छिपाने के लिए एक्सपोर्ट पर हद से ज्यादा निर्भर है, जो विदेशी कंपनियों के लिए अनुचित प्रतिस्पर्धा पैदा कर रहा है। प्रशासन अब 7.5% का नया लेवी (levy) लगाने पर विचार कर रहा है, जो खास तौर पर औद्योगिक क्षमता और लेबर प्रैक्टिस से जुड़े मामलों पर आधारित होगा।
लीगल चुनौती और रिस्क
यह रणनीति अचानक नहीं बदली है। फरवरी 2026 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की इमरजेंसी शक्तियों के तहत लगाए गए ब्रॉड टैरिफ को असंवैधानिक करार दिया था। अब सरकार 'एविडेंस-बेस्ड' एक्शन की ओर बढ़ रही है।
हालांकि, इसके साथ रिस्क भी जुड़े हैं। Tax Foundation की रिपोर्ट के अनुसार, टैरिफ बढ़ने से कंज्यूमर की जेब पर असर पड़ता है। पहले ऐसे कदमों से रिटेल कीमतों में लगभग 7% तक की बढ़ोतरी देखी गई थी। अब बाजार की नजर इस बात पर है कि G20 देश इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या इससे वैश्विक स्तर पर कोई नई ट्रेड नीति उभरकर सामने आती है।
