US Treasury का बॉन्ड बायबैक प्रोग्राम बेअसर साबित हुआ है और 30-वर्षीय बॉन्ड यील्ड फिर से **5.27%** के स्तर पर पहुंच गई है। यह स्थिति भारतीय निवेशकों के लिए चिंता का विषय हो सकती है, क्योंकि ग्लोबल मार्केट में बढ़ती यील्ड का सीधा असर भारत में विदेशी निवेश और लिक्विडिटी पर पड़ता है।
बाजार बनाम सरकार की लड़ाई
अमेरिकी वित्त विभाग (US Treasury Department) ने बॉन्ड मार्केट की लागत को कम करने के लिए जो बायबैक प्रोग्राम शुरू किया था, वह फिलहाल विफल होता दिख रहा है। यील्ड का वापस 5.27% के स्तर पर लौटना यह दर्शाता है कि भारी सरकारी खर्च और लगातार बढ़ती महंगाई के दबाव के आगे सरकारी हस्तक्षेप कमजोर पड़ रहा है।
फेड रेट और बढ़ती चिंताएं
मार्केट का पूरा ध्यान अब Federal Reserve की अगली बैठक पर है। 2-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड बढ़कर 4.40% हो गई है, जिससे निवेशकों को डर है कि फेडरल रिजर्व लंबे समय बाद फिर से ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है। निवेशकों का मानना है कि स्ट्रक्चरल इन्फ्लेशन और बढ़ते कर्ज के बोझ के कारण आने वाले समय में ब्याज दरें ऊंची बनी रहेंगी।
ग्लोबल डेट मार्केट का दबाव
यह संकट सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं है। जर्मनी, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे बड़े देशों में भी लॉन्ग-टर्म बॉन्ड यील्ड मल्टी-ईयर हाई पर पहुंच गई है। दुनिया भर में लिक्विडिटी के लिए मची इस होड़ ने बॉन्ड यील्ड को ऊपर की तरफ धकेल दिया है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
भारतीय शेयर बाजार के लिहाज से यह डेटा बेहद जरूरी है। जब अमेरिका में सरकारी बॉन्ड पर सुरक्षित और अधिक रिटर्न मिलता है, तो विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) उभरते बाजारों जैसे कि भारत से अपना पैसा निकालकर अमेरिकी बॉन्ड्स में शिफ्ट कर देते हैं। FIIs की इस बिकवाली से भारतीय बाजार में लिक्विडिटी की कमी और उतार-चढ़ाव (Volatility) बढ़ने का रिस्क पैदा हो जाता है। इसके अलावा, ऊंची यील्ड के कारण ग्लोबल स्तर पर कर्ज लेना महंगा बना रहेगा, जिसका असर उन कंपनियों पर होगा जो विदेशी फंडिंग पर निर्भर हैं।
