अमेरिका ने H-1B वीजा नियमों को और भी सख्त कर दिया है। अब कंपनियों को भारतीय कर्मचारियों को भेजने से पहले छंटनी का रिकॉर्ड देना होगा और भारी फीस भी चुकानी पड़ेगी, जिससे भारतीय IT सेक्टर पर सीधा असर पड़ना तय है।
अमेरिकी प्रशासन ने H-1B वीजा प्रोग्राम के लिए नए सख्त नियम लागू कर दिए हैं, जो भारतीय IT कंपनियों के पारंपरिक बिजनेस मॉडल के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आए हैं। नए निर्देश के मुताबिक, अगर कोई कंपनी विदेशी कर्मचारियों को बुलाना चाहती है, तो उसे पहले अपने घरेलू छंटनी (layoff) के इतिहास का ऑडिट कराना होगा। इसका मुख्य मकसद अमेरिकी वर्कफोर्स को सुरक्षित करना है ताकि कंपनियां स्थानीय कर्मचारियों को हटाकर सस्ते विदेशी पेशेवरों को काम पर न रख सकें।
फीस का बड़ा झटका
नियमों में बदलाव के साथ ही, $100,000 की भारी फीस भी तय की गई है, जो सितंबर 2027 तक लागू रहेगी। फिलहाल, अमेरिका के कुल H-1B वीजा में भारतीय पेशेवरों की हिस्सेदारी करीब 71% है। ऐसे में भारतीय IT कंपनियां सीधे तौर पर इन बदलावों की चपेट में आ गई हैं। पहले ये कंपनियां भारत से टैलेंट भेजकर अपनी कॉस्ट को कम रखती थीं, लेकिन अब यह मॉडल महंगा साबित हो रहा है।
मार्जिन पर क्या होगा असर?
इस दबाव से निपटने के लिए भारतीय कंपनियां अमेरिका में ही लोकल टैलेंट हायर कर रही हैं। हालांकि, अमेरिका में सैलरी का स्तर भारत के मुकाबले काफी ज्यादा है। इसका सीधा असर ऑपरेटिंग मार्जिन (Operating Margin) पर पड़ रहा है। जैसे-जैसे डिलीवरी कॉस्ट बढ़ेगी, कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बढ़ना निश्चित है।
निवेशकों को अब यह देखना होगा कि कंपनियां किस तरह अपनी हायरिंग स्ट्रैटेजी बदलती हैं और वीजा निर्भरता को कैसे कम करती हैं। आने वाली तिमाहियों के फाइनेंशियल डिस्क्लोजर में इसका असर साफ देखने को मिल सकता है।
