US राष्ट्रपति Donald Trump ने सेक्शन 301 के तहत **60** देशों के आयात पर **10%** से **12.5%** तक का टैरिफ बरकरार रखा है। बढ़ती महंगाई और जनता की **64%** असहमति के बावजूद यह नीति मिड-टर्म चुनाव (3 नवंबर) से पहले ग्लोबल सप्लाई चेन के लिए बड़ी अनिश्चितता पैदा कर रही है।
ट्रेड पॉलिसी और इकोनॉमिक असर
US की मौजूदा ट्रेड पॉलिसी के केंद्र में 'Trade Act of 1974' का सेक्शन 301 है। इस दायरे में भारत सहित यूरोपियन यूनियन, जापान, मेक्सिको और कनाडा जैसे बड़े ट्रेड पार्टनर शामिल हैं। सरकार का कहना है कि यह कदम ट्रेड इम्बैलेंस को सुधारने के लिए है, लेकिन हकीकत में इसका सीधा असर बिजनेस कॉस्ट और आम नागरिकों की जेब पर पड़ रहा है।
महंगाई और सुप्रीम कोर्ट का एंगल
फरवरी 2026 में US सुप्रीम कोर्ट द्वारा IEEPA के इस्तेमाल पर रोक लगाने के बाद, प्रशासन ने सेक्शन 301 का रुख किया। Federal Reserve Bank of New York की रिपोर्ट के मुताबिक, इन टैरिफ्स ने साल के शुरुआती दो महीनों में गुड्स इन्फ्लेशन में 2.9% का इजाफा किया है। यह डेटा साफ दिखाता है कि टैरिफ से मिलने वाला फायदा, बढ़ती महंगाई की मार के नीचे दब रहा है।
निवेशकों के लिए चुनौतियां
3 नवंबर, 2026 को होने वाले मिड-टर्म चुनावों से पहले राजनीतिक माहौल गर्म है। ट्रेड पॉलिसी के विरोध में जनता की असहमति 58% से बढ़कर 64% तक पहुंच गई है। निवेशकों के लिए फिलहाल दो बड़ी चिंताएं हैं:
- मार्जिन का दबाव: कंपनियों को या तो इन बढ़ी हुई लागतों को खुद सहना होगा, जिससे प्रॉफिट मार्जिन घटेगा, या फिर इसे ग्राहकों पर डालना होगा, जिससे डिमांड गिरने का खतरा है।
- रिटालिएशन का रिस्क: प्रभावित देशों की तरफ से किसी भी जवाबी कार्रवाई (Retaliatory measures) की आशंका ने मल्टीनेशनल कंपनियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
बाजार की नजर अब इस बात पर है कि चुनावों के बाद ट्रेड पॉलिसी में क्या कोई बदलाव आता है या प्रशासन अपनी इसी सख्त नीति पर कायम रहता है।
