अप्रैल **2025** में लागू की गई अमेरिका की आक्रामक टेरिफ नीति का असर उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा है। ट्रेड डेफिसिट में कोई खास कमी नहीं आई है और मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में वियतनाम और ताइवान जैसे देश उभरे हैं, जो भारतीय निवेशकों के लिए एक जटिल स्थिति पैदा कर रहे हैं।
उम्मीदें बनाम हकीकत
अमेरिका ने घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए जो भारी ड्यूटी लगाई थी, वह 18 महीने बीत जाने के बाद भी अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर पाई है। डेटा साफ इशारा कर रहा है कि ट्रेड डेफिसिट में कोई ठोस गिरावट नहीं आई है। उलटे, कंपनियों ने अमेरिका लौटने के बजाय वियतनाम और ताइवान जैसे देशों में अपना प्रोडक्शन सेटअप शिफ्ट कर लिया है।
हाई-टेक निर्भरता और सप्लाई चेन में बदलाव
अमेरिकी इंडस्ट्री, विशेष रूप से डेटा सेंटर और टेक्नोलॉजी सेक्टर, आज भी सेमीकंडक्टर के लिए विदेशी आयात पर बुरी तरह निर्भर है। चीन, कोरिया और जापान की कंपनियों ने टेरिफ के इस दौर में खुद को ढालते हुए अपनी असेंबली लाइनें वियतनाम में ट्रांसफर कर दी हैं, जो अब मशीनरी और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए एक ग्लोबल एक्सपोर्ट हब बन चुका है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
ग्लोबल स्तर पर चल रही 'चाइना प्लस वन' (China Plus One) की रणनीति भारत के लिए अवसर तो लाती है, लेकिन वियतनाम जैसे देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा भी बढ़ाती है। भारतीय कंपनियों, खासकर आईटी सर्विसेज, ऑटो कंपोनेंट्स और फार्मा सेक्टर के लिए ग्लोबल ट्रेड में बढ़ती अस्थिरता चिंता का विषय बनी हुई है।
बदलता कानूनी परिदृश्य
फरवरी 2026 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद, वहां का प्रशासन अब केवल बेसिक इम्पोर्ट टैक्स के बजाय सेकेंडरी सैंक्शन्स और नेशनल सिक्योरिटी जैसे जटिल हथकंडे अपना रहा है। यह संकेत है कि ट्रेड वॉर अब और अधिक पेचीदा होने वाला है। आने वाली तिमाहियों में निवेशकों को सेमीकंडक्टर एक्सेस और लॉजिस्टिक्स की लागत पर पैनी नजर रखने की जरूरत है।
