व्हाइट हाउस ने H-1B और अन्य नॉन-इमिग्रेंट वीजा धारकों के लिए **60 दिन** की ग्रेस पीरियड खत्म करने वाले प्रस्ताव की समीक्षा पूरी कर ली है। हालांकि यह नियम अभी अंतिम नहीं है, लेकिन इसकी संभावना ने भारतीय IT प्रोफेशनल्स और कंपनियों के लिए अनिश्चितता बढ़ा दी है।
व्हाइट हाउस ने होमलैंड सिक्योरिटी विभाग के उस प्रस्ताव की समीक्षा पूरी कर ली है, जो H-1B, L-1, और O-1 वीजा धारकों के लिए उपलब्ध 60 दिन की ग्रेस पीरियड को खत्म कर सकता है। साल 2017 से लागू यह विंडो विदेशी वर्कर्स को नौकरी छूटने के बाद नया नियोक्ता खोजने या वीजा स्टेटस बदलने के लिए 2 महीने का समय देती है।
भारतीय IT कंपनियों पर असर
भारतीय निवेशकों के लिए यह खबर काफी अहम है क्योंकि भारतीय IT कंपनियों का सबसे बड़ा बाजार अमेरिका ही है। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, इंफोसिस, विप्रो, HCL टेक और टेक महिंद्रा जैसी दिग्गज कंपनियां अपने हाई-स्किल्ड वर्कफोर्स को अमेरिका भेजने के लिए H-1B वीजा पर निर्भर हैं। आंकड़ों के मुताबिक, H-1B वीजा पाने वालों में लगभग 71% भारतीय हैं। यदि यह ग्रेस पीरियड खत्म होता है, तो इन कंपनियों के लिए टैलेंट मैनेजमेंट और प्रोजेक्ट्स के बीच कर्मचारियों को शिफ्ट करना महंगा और चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
रेगुलेटरी स्थिति और अगली प्रक्रिया
निवेशकों को यह समझना चाहिए कि यह प्रस्ताव अभी कानून नहीं बना है। व्हाइट हाउस की समीक्षा (RIN 1615-AD22) का चरण पूरा होना एक बड़ी प्रक्रिया है, लेकिन यह अभी अंतिम नहीं है। अगला कदम इसे 'फेडरल रजिस्टर' में प्रकाशित करना है, जिसके बाद पब्लिक कमेंट्स मांगे जाएंगे। अंतिम नियम इसी फीडबैक के आधार पर तय होगा।
निवेशकों के लिए नजर रखने वाली बातें
IT सेक्टर में लेबर चर्न (कर्मचारियों का आना-जाना) बढ़ने की चिंता बनी हुई है। हालांकि अभी इसका सीधा असर बैलेंस शीट पर नहीं है, लेकिन आने वाली तिमाही के नतीजों के दौरान मैनेजमेंट की कमेंट्री पर नजर रखना जरूरी होगा। निवेशकों को यह ट्रैक करना चाहिए कि कंपनियां अपनी इमिग्रेशन सपोर्ट रणनीतियों को कैसे बदलती हैं, क्योंकि अमेरिकी इमिग्रेशन पॉलिसी में कोई भी बड़ा बदलाव भारतीय कंपनियों की लागत और कामकाज की आसानी को प्रभावित कर सकता है।
