व्हाइट हाउस ने अपनी एक रिपोर्ट में भारत समेत 40 से ज़्यादा देशों पर चीनी सामानों पर लगने वाले टैरिफ से बचने के लिए मिलीभगत का आरोप लगाया है। अमेरिका अब AI-पावर्ड कस्टम सिस्टम का इस्तेमाल कर ऐसे रूट किए गए सामानों की पहचान करेगा, जिससे भारतीय एक्सपोर्टर्स पर जांच का शिकंजा कस सकता है।
अमेरिका की बड़ी रिपोर्ट में भारत पर आरोप
व्हाइट हाउस की ट्रेड एंड मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी ऑफिस ने 13 अगस्त, 2026 को 'द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम' (The Great Transshipment Scam) नाम से एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में भारत समेत 40 से ज़्यादा देशों पर चीन के टैरिफ चोरी में मददगार होने का गंभीर आरोप लगाया गया है। रिपोर्ट में भारत को 'टियर 1' (Diversified Scale Leader) देश बताया गया है, जहाँ कथित तौर पर वैध व्यापार के तरीकों में ही सामानों को दूसरी जगह भेजने (transshipment) का जोखिम छिपा हुआ है।
रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी मैन्युफैक्चरर्स इन देशों का इस्तेमाल अपने सामानों की मूल जगह छिपाने के लिए कर रहे हैं। वे इन सामानों को प्रोसेस, री-लेबल या री-पैक करवाकर अमेरिका भेजते हैं, ताकि 2018 से चीनी सामानों पर लगे आयात शुल्कों से बचा जा सके। दूसरी देशों से रूट किए जाने पर ये सामान अमेरिकी बाज़ार में आसानी से प्रवेश कर पाते हैं।
AI से कस्टम जांच का नया तरीका
इस धांधली को रोकने के लिए, अमेरिकी प्रशासन 'डिटेक्टिव बॉर्डर' (Detective Border) नाम का एक AI-संचालित सिस्टम लाने की तैयारी में है। यह टेक्नोलॉजी शिपमेंट के रूट, मालिकाना हक जैसी जटिल जानकारी का विश्लेषण करके असली और अवैध व्यापार के बीच फर्क कर पाएगी। इससे अमेरिकी कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन (CBP) को हाई-रिस्क वाली शिपमेंट्स की पहचान करने में आसानी होगी।
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से जुड़ी कंपनियों और निवेशकों के लिए यह एक बड़ी अनिश्चितता लेकर आया है। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका अवैध रूप से भेजी गई खेपों पर पिछले साल से रेट्रोएक्टिव टैरिफ (retroactive tariff claims) भी लगा सकता है। इससे उन फर्मों के लिए बड़ा वित्तीय जोखिम पैदा हो सकता है जो ऐसी सप्लाई चेन पर निर्भर हैं जहाँ सामानों को अलग-अलग देशों में असेंबल या प्रोसेस किया जाता है।
भारतीय एक्सपोर्टर्स पर क्या होगा असर?
जिन भारतीय कंपनियों का US एक्सपोर्ट मार्केट में बड़ा दखल है, उन्हें अब कड़े अनुपालन नियमों (compliance requirements) और ज़्यादा डॉक्यूमेंटेशन का सामना करना पड़ सकता है। खासकर वो इंडस्ट्रीज़ जो रॉ मटेरियल या कंपोनेंट्स इम्पोर्ट करके उन्हें असेंबल करती हैं और फिर एक्सपोर्ट करती हैं ('स्क्रूड्राइवर' ऑपरेशन्स), उनकी जांच और ज़्यादा कड़ी हो सकती है। इस नई अमेरिकी नीति से सामान की मूल उत्पत्ति साबित करने के लिए प्रशासनिक लागत (administrative costs) बढ़ सकती है।
हालांकि रिपोर्ट का मुख्य फोकस व्यापार कानूनों को लागू करवाना है, लेकिन निवेशकों के लिए इसका सीधा मतलब है कि रेगुलेटरी बैरियर्स (regulatory barriers) बढ़ सकते हैं। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि भारतीय कस्टम्स और एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड कंपनियाँ किस तरह अपनी सप्लाई चेन की जानकारी को नई अमेरिकी प्रवर्तन नीतियों के मुताबिक ढालती हैं, और क्या इससे अमेरिका और अन्य नामित देशों के बीच बड़े व्यापारिक विवाद खड़े होते हैं।
