व्हाइट हाउस की एक हालिया रिपोर्ट 'द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम' में भारत का नाम उन देशों में शामिल है, जिनका इस्तेमाल चीनी सामान पर लगने वाले अमेरिकी टैरिफ से बचने के लिए किया जा रहा है।
व्हाइट हाउस ने 'द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम' नाम से एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें दावा किया गया है कि चीनी निर्यातक अपने माल को 40 से ज्यादा देशों के रास्ते अमेरिका भेज रहे हैं ताकि टैरिफ से बचा जा सके। इस लिस्ट में भारत के अलावा वियतनाम और मैक्सिको का नाम भी शामिल है। यह खबर भारतीय निवेशकों के लिए अहम है, खासकर उन लोगों के लिए जो मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स और टेक्सटाइल सेक्टर पर नजर रखते हैं।
रेवेन्यू का भारी नुकसान
रिपोर्ट के मुताबिक, इस हेरफेर की वजह से अमेरिकी खजाने को सालाना $19 बिलियन से लेकर $34 बिलियन तक का नुकसान हो रहा है। फिलहाल अमेरिका ने भारत पर कोई नया टैरिफ नहीं लगाया है, लेकिन एडमिनिस्ट्रेशन ने 'डिटेक्टिव बॉर्डर' (Detective Border) नाम की एक पहल का ऐलान किया है। यह AI-आधारित सिस्टम इंपोर्ट किए गए सामानों की बारीकी से जांच करेगा ताकि यह पता लगाया जा सके कि सामान वास्तव में कहां से बनकर आया है।
'China Plus One' स्ट्रैटेजी पर खतरा
जो कंपनियां 'चाइना प्लस वन' स्ट्रैटेजी अपना रही हैं और भारत को अपना मैन्युफैक्चरिंग हब बना रही हैं, उनके लिए यह एक रेगुलेटरी रिस्क हो सकता है। कई कंपनियां चीन से कच्चे माल या पुर्जे मंगवाकर भारत में असेंबल करती हैं और फिर अमेरिका भेजती हैं। अगर अमेरिका ने 'कंट्री ऑफ ओरिजिन' (Country of Origin) के नियमों को और कड़ा कर दिया, तो भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए कंप्लायंस कॉस्ट बढ़ सकती है और शिपमेंट में देरी हो सकती है।
फिलहाल यह कोई ट्रेड वॉर जैसी स्थिति नहीं है, लेकिन अमेरिका के कड़े रुख को देखते हुए भारतीय मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को आने वाले समय में अपने सप्लाई चेन स्ट्रक्चर पर फिर से विचार करना पड़ सकता है, जिसका असर भविष्य में उनके मुनाफे पर भी पड़ सकता है।
