अमेरिका में महंगाई के आगे वेतन की रफ्तार धीमी पड़ गई है, जिससे लगातार पांचवें महीने लोगों की क्रय शक्ति (Purchasing Power) कम हुई है। कर्ज के दम पर चल रहे अमेरिकी कंजम्पशन का यह मॉडल भारतीय एक्सपोर्ट और आईटी सेक्टर के लिए जोखिम पैदा कर रहा है।
अमेरिकी अर्थव्यवस्था एक गंभीर संरचनात्मक चुनौती का सामना कर रही है। पिछले 5 महीनों से औसत प्रति घंटा कमाई (Hourly Earnings) महंगाई से पिछड़ गई है। इसका मतलब है कि कागजों पर वेतन बढ़ने के बावजूद, लोगों की असल खरीदने की क्षमता (Real Wage) तेजी से घट रही है, जिससे आम परिवारों का बजट बिगड़ रहा है।
कर्ज के सहारे चल रही खपत
क्रय शक्ति कम होने के बावजूद अमेरिकी कंज्यूमर स्पेंडिंग अभी भी स्थिर दिख रही है, लेकिन इसके पीछे की सच्चाई चिंताजनक है। लोग अपनी कमाई के बजाय क्रेडिट कार्ड और पर्सनल लोन का सहारा ले रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि पर्सनल सेविंग्स रेट 4 साल के निचले स्तर पर पहुंच गई है। यह स्पष्ट संकेत है कि मौजूदा डिमांड आय से नहीं, बल्कि कर्ज से पैदा हो रही है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्यों है जरूरी?
अमेरिका भारत के आईटी (IT) सर्विसेज और मैन्युफैक्चर्ड गुड्स के लिए सबसे बड़ा बाजार है। अगर अमेरिकी परिवारों की उधार लेने की क्षमता खत्म होती है और वे खर्च में कटौती करते हैं, तो भारत की एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड कंपनियों के ऑर्डर और प्रोजेक्ट्स पर बुरा असर पड़ सकता है। आईटी कंपनियों के रेवेन्यू और नई हायरिंग पर इसका सीधा प्रभाव देखने को मिल सकता है।
रिस्क और निवेश की रणनीति
बाजार में 'अफोर्डेबिलिटी क्रंच' का खतरा मंडरा रहा है। अगर महंगाई कम नहीं होती और ब्याज दरें ऊंची बनी रहती हैं, तो कंजम्पशन में गिरावट तय है। फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) अभी भी अर्थव्यवस्था को संतुलित करने की कोशिश में है, लेकिन लेबर मार्केट में कमजोरी ने स्थिति को जटिल बना दिया है। निवेशकों को अब अमेरिकी रिटेल सेल्स, क्रेडिट कार्ड डेलिंक्वेंसी रेट और भारतीय आईटी कंपनियों के तिमाही नतीजों पर पैनी नजर रखने की जरूरत है।
