अमेरिकी सरकार ने H-1B वीज़ा के लिए एक नए नियम का प्रस्ताव रखा है, जिसके तहत कैप-सबजेक्ट पिटीशन पर **$103,265** (लगभग **₹86 लाख**) का भारी-भरकम शुल्क लगाया जाएगा। यह भारतीय IT कंपनियों के लिए एक बड़ा झटका है, खासकर AI के बढ़ते इस्तेमाल और फ्रेशर्स को ट्रेनिंग देकर अमेरिका भेजने की पारंपरिक मॉडल पर।
H-1B वीज़ा पर ₹86 लाख का शुल्क!
अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) ने H-1B वीज़ा को लेकर एक बड़ा प्रस्ताव पेश किया है। इसके तहत, हर कैप-सबजेक्ट H-1B वीज़ा पिटीशन पर $103,265 (लगभग ₹86 लाख) का एक अलग से शुल्क देना होगा। यह प्रस्ताव अगस्त 2026 में लागू हो सकता है और इसका मकसद इमिग्रेशन सिस्टम की लागत वसूलना और घरेलू श्रमिकों को प्राथमिकता देना है।
अगर यह नियम लागू हुआ, तो भारतीय IT सर्विस कंपनियों के लिए अमेरिका में टैलेंट भेजना काफी महंगा हो जाएगा। ये कंपनियां लंबे समय से H-1B वीज़ा प्रोग्राम का इस्तेमाल भारत और अमेरिका के बीच टैलेंट की कमी को पूरा करने के लिए करती आई हैं।
बिज़नेस मॉडल पर असर?
इस नए शुल्क से भारतीय IT कंपनियों के पारंपरिक बिज़नेस मॉडल पर बड़ा दबाव आने की आशंका है। पहले ये कंपनियां भारत में फ्रेश ग्रेजुएट्स को रिक्रूट करती थीं, उन्हें ट्रेनिंग देती थीं और फिर अमेरिका में क्लाइंट साइट्स पर भेजती थीं। लेकिन $103,265 के वीज़ा शुल्क के साथ, एंट्री-लेवल प्रोफेशनल को अमेरिका भेजना अब आर्थिक रूप से सही नहीं लगता।
माना जा रहा है कि इससे कंपनियां अब फ्रेशर्स के 'ट्रेनिंग-एंड-डिप्लॉयमेंट' मॉडल से दूर हट जाएंगी। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि कंपनियां अब अपने ऑनसाइट स्टाफ में सीनियर प्रोफेशनल्स, प्रोजेक्ट मैनेजर्स और एक्सपर्ट्स को प्राथमिकता देंगी, जिनकी वैल्यू क्लाइंट के लिए ज्यादा हो। वहीं, एंट्री-लेवल काम के लिए वे ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) का इस्तेमाल बढ़ा सकती हैं या सीधे अमेरिका में ही टैलेंट हायर कर सकती हैं।
AI और फ्रेशर्स पर दोहरा वार
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का तेज़ी से बढ़ता इस्तेमाल भी एंट्री-लेवल वीज़ा पिटीशन की व्यवहार्यता को चुनौती दे रहा है। ChatGPT और Claude जैसे AI टूल्स अब कोडिंग, टेस्टिंग और डिबगिंग जैसे काम आसानी से कर रहे हैं, जो पहले जूनियर डेवलपर्स करते थे। AI की बढ़ती क्षमता के साथ, ऑनसाइट प्रोजेक्ट्स के लिए एंट्री-लेवल कर्मचारियों की मांग पहले से ही कम हो रही है। ऐसे में, भारी-भरकम वीज़ा शुल्क इस ट्रेंड को और तेज कर देगा।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यह अभी सिर्फ एक प्रस्ताव है, जिस पर 30 दिनों की पब्लिक कमेंट पीरियड के बाद फैसला होगा। उम्मीद है कि इसे कानूनी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ेगा, जैसा कि 2025 में एक ऐसे ही प्रस्ताव के साथ हुआ था।
फिर भी, अगर यह शुल्क लागू होता है या इसमें बदलाव होता है, तो भी ऑनसाइट निर्भरता कम होने का ट्रेंड बना रहेगा। निवेशकों को मैनेजमेंट से मार्जिन सस्टेनेबिलिटी पर कमेंट्री पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि कंपनियां शायद यह अतिरिक्त लागत सीधे क्लाइंट्स पर न डाल पाएं। साथ ही, अमेरिका में लोकल हायरिंग की गति और GCCs के विस्तार पर भी नजर रखनी होगी।
