H-1B वीज़ा पर अमेरिका का बड़ा झटका! भारतीय IT कंपनियों के लिए लागत ₹86 लाख पार, क्या होगा असर?

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AuthorNeha Patil|Published at:
H-1B वीज़ा पर अमेरिका का बड़ा झटका! भारतीय IT कंपनियों के लिए लागत ₹86 लाख पार, क्या होगा असर?

अमेरिका से भारतीय IT कंपनियों के लिए एक बुरी खबर आ रही है। अमेरिकी गृह मंत्रालय (DHS) ने H-1B वीज़ा के लिए ₹103,265 (लगभग ₹86 लाख) की भारी-भरकम फीस का प्रस्ताव दिया है। इस कदम से भारतीय IT फर्मों के लिए अमेरिका में काम करने वाले कर्मचारियों की लागत काफी बढ़ सकती है। यह प्रस्ताव अभी 30 दिन की सार्वजनिक टिप्पणी के लिए खुला है और माना जा रहा है कि इसे कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

अमेरिकी सरकार का प्रस्ताव: क्या है ₹103,265 की नई फीस?

अमेरिकी गृह मंत्रालय (Department of Homeland Security - DHS) ने H-1B वीज़ा के लिए एक नए शुल्क का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत, H-1B वीज़ा पर निर्भर रहने वाले आवेदनों के लिए $103,265 (भारतीय मुद्रा में लगभग ₹86 लाख) की फीस देनी पड़ सकती है। मंत्रालय का कहना है कि यह फीस अप्रवासन कार्यक्रमों से जुड़े प्रशासनिक खर्चों को पूरा करने के लिए है, जिसमें अमेरिकी नागरिकता और आव्रजन सेवा (USCIS) और अन्य संघीय एजेंसियों के खर्च शामिल हैं। यह प्रस्ताव फिलहाल 30 दिनों की सार्वजनिक समीक्षा अवधि में है और अभी यह कोई अंतिम कानून नहीं है।

भारतीय IT सेक्टर पर संभावित असर

भारतीय IT सेक्टर, जो अमेरिका में अपने कुशल पेशेवरों को भेजने के लिए H-1B वीज़ा पर बहुत ज़्यादा निर्भर करता है, के लिए यह खबर चिंताजनक है। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), इंफोसिस, विप्रो, एचसीएल टेक और टेक महिंद्रा जैसी बड़ी भारतीय IT कंपनियाँ अपने ऑन-साइट ऑपरेशंस के लिए H-1B वीज़ा प्रोग्राम का इस्तेमाल करती हैं। अगर यह भारी-भरकम फीस लागू हो जाती है, तो इन कंपनियों के लिए कर्मचारियों को काम पर रखने और तैनात करने की लागत में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा होगा।

वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के ऊंचे शुल्क से कंपनियों के मुनाफ़े पर दबाव बढ़ सकता है। IT सेवाओं का बिज़नेस मॉडल अक्सर लागत को अनुकूलित करते हुए उच्च-मूल्य वाली सेवाएँ देने पर आधारित होता है; प्रति वीज़ा इतनी बड़ी राशि इन कंपनियों को अपनी ऑन-साइट स्टाफिंग रणनीतियों पर फिर से विचार करने या ग्राहकों पर यह लागत डालने के लिए मजबूर कर सकती है, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धी कीमतों पर असर पड़ सकता है।

कानूनी अनिश्चितता और पिछली घटनाएं

यह प्रस्ताव अमेरिकी सरकार के लिए एक हालिया कानूनी झटके के बाद आया है। इससे पहले, सरकार ने इसी तरह का $100,000 का शुल्क लगाने की कोशिश की थी, जिसे अदालत में चुनौती दी गई थी और जून 2026 में एक संघीय न्यायाधीश ने इसे रद्द कर दिया था। इसके बाद, जुलाई 2026 में एक अपीलीय अदालत ने भी इस फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। इस इतिहास को देखते हुए, उद्योग के विशेषज्ञ उम्मीद कर रहे हैं कि इस नए प्रस्ताव को भी इसकी वैधता और आर्थिक प्रभाव को लेकर तत्काल कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

यह प्रस्तावित शुल्क सालाना 85,000 H-1B वीज़ा आवेदनों पर लागू होगा, जिसमें नियमित कोटा और उन्नत डिग्री वाले उम्मीदवारों के लिए छूट शामिल है। हालांकि, इसमें विश्वविद्यालयों और गैर-लाभकारी अनुसंधान संगठनों जैसी 'कैप-एग्ज़ेम्प्ट' संस्थाएं शामिल नहीं होंगी।

निवेशकों के लिए ध्यान रखने योग्य बातें

निवेशकों को 30-दिवसीय सार्वजनिक टिप्पणी अवधि के दौरान इस प्रस्ताव के विकसित होने पर नज़र रखनी चाहिए। अंतिम निर्णय इस बात पर निर्भर करेगा कि यह नियम कानूनी जांच में कितना टिक पाता है और क्या सरकार वैश्विक प्रतिभा को बनाए रखने में इस शुल्क की बाधा डालने की क्षमता के बारे में व्यापार समुदाय द्वारा उठाई गई चिंताओं को संबोधित करती है। मुख्य बात केवल प्रस्ताव ही नहीं, बल्कि इसके लागू होने की संभावना, अदालतों द्वारा इसमें देरी या अंतिम नियम बनने से पहले इसमें महत्वपूर्ण बदलावों पर भी ध्यान देना होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.