अमेरिका में PERM फाइलिंग पर रोक से भारतीय IT कंपनियों की चिंताएं बढ़ गई हैं। यह कदम ग्रीन कार्ड प्रक्रिया का पहला चरण है, जिससे TCS, Infosys और Wipro जैसे दिग्गज IT स्टॉक्स के सामने टैलेंट रिटेंशन और लागत बढ़ने का खतरा खड़ा हो गया है।
अमेरिकी प्रशासन द्वारा PERM (Permanent Labor Certification) फाइलिंग को रोकने का फैसला भारतीय IT जगत के लिए एक बड़ा सिरदर्द बन गया है। यह प्रक्रिया विदेशी पेशेवरों के लिए ग्रीन कार्ड पाने का पहला और सबसे अहम कदम है। इस निर्णय का सीधा असर Tata Consultancy Services (TCS), Infosys, Wipro, HCL Technologies और Cognizant जैसी बड़ी कंपनियों पर पड़ना तय है, जो बड़ी संख्या में H-1B वीजा धारकों पर निर्भर हैं।
निवेशकों के लिए क्यों है चिंता की बात?
निवेशकों की सबसे बड़ी चिंता कंपनी की 'ऑपरेशनल स्टेबिलिटी' यानी कामकाज में स्थिरता को लेकर है। जब PERM का रास्ता बंद होता है, तो अमेरिका में काम कर रहे प्रोफेशनल्स के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ जाती है। ऐसे में कंपनियों में Attrition Rate (कर्मचारियों के छोड़ने की दर) बढ़ने की पूरी संभावना है, क्योंकि अनुभवी लोग अधिक स्थिरता वाले अवसरों की तलाश में दूसरी जगह जा सकते हैं।
बढ़ेगी कंपनी की लागत (Cost Pressure)
ज्यादा एट्रिशन का मतलब है—भर्ती, ऑनबोर्डिंग और ट्रेनिंग पर होने वाले खर्चों में इजाफा। यह अतिरिक्त खर्च सीधे तौर पर कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डाल सकता है। साथ ही, जटिल प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करने के लिए एक स्थिर ऑनसाइट टीम का होना बहुत जरूरी है, जो इस पॉलिसी बदलाव के चलते चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
आगे क्या होगा?
यह घटनाक्रम US की इमिग्रेशन पॉलिसी और उप-राष्ट्रपति JD Vance द्वारा विदेशी लेबर पर दिए गए बयानों के इर्द-गिर्द घूम रहा है। प्रशासन इसे घरेलू कार्यबल को प्राथमिकता देने के रूप में देख रहा है, लेकिन IT कंपनियों के लिए यह एक बड़ा HR चैलेंज है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या ये कंपनियां अपनी हायरिंग स्ट्रैटेजी बदलती हैं और अमेरिका में ही स्थानीय टैलेंट को भर्ती करने पर ज्यादा जोर देती हैं या नहीं। निवेशकों को सलाह है कि वे कंपनियों के मैनेजमेंट की कमेंट्री पर नजर रखें कि वे इस रेगुलेटरी बाधा से निपटने के लिए क्या कदम उठा रहे हैं।
