अमेरिका का नेशनल डेट (National Debt) आधिकारिक तौर पर **$40 ट्रिलियन** के आंकड़े को पार कर गया है। इस रिकॉर्ड उधारी ने वैश्विक आर्थिक स्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं, जिसका सीधा असर भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट्स पर पड़ सकता है।
दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था पर कर्ज का बोझ अब $40 ट्रिलियन के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया है। इस भारी-भरकम कर्ज के साथ ही इसे चुकाने की लागत भी बढ़ती जा रही है। पिछले दो दशकों में 30-year US Treasury bond की यील्ड ने रिकॉर्ड स्तर छुआ है, जिससे ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम में उथल-पुथल की स्थिति पैदा हो गई है।
निवेशकों के लिए क्यों है यह चिंताजनक?
जब अमेरिका जैसे बड़े देश पर कर्ज का दबाव बढ़ता है, तो पूरी दुनिया के मार्केट प्रभावित होते हैं। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड ग्लोबल स्तर पर 'बेंचमार्क' का काम करती है। अगर यह यील्ड ऊंची बनी रहती है, तो निवेशक इमर्जिंग मार्केट्स जैसे भारत से पैसा निकाल सकते हैं और अमेरिकी बॉन्ड में निवेश करना बेहतर समझते हैं। इसी को हम FII आउटफ्लो कहते हैं, जो भारतीय शेयर बाजार में बड़ी गिरावट और रुपये की चाल में अस्थिरता पैदा कर सकता है।
ट्रेड और खपत का फासला
केवल सरकारी कर्ज ही नहीं, बल्कि ग्लोबल ट्रेड इम्बैलेंस भी एक बड़ी समस्या है। कई बार देशों द्वारा टैरिफ (Tariffs) बढ़ाकर ट्रेड गैप कम करने की कोशिश की जाती है, लेकिन यह मूल समस्या का हल नहीं है। असली समस्या देशों के 'सेविंग' और 'कंजम्पशन' के बीच का अंतर है। जब तक यह स्ट्रक्चरल समस्या हल नहीं होती, टैरिफ केवल ट्रेड के रास्ते बदलने का काम करते हैं।
अब आगे क्या देखें?
अगले कुछ महीनों में निवेशकों को इन तीन बातों पर नजर रखनी चाहिए:
- US Treasury Auctions: इससे यह पता चलेगा कि उधारी की लागत और बढ़ेगी या स्थिर होगी।
- ट्रेड पॉलिसी: ग्लोबल ट्रेड नीतियों में कोई भी बड़ा बदलाव सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकता है।
- Federal Reserve: फेडरल रिजर्व के बयानों पर पैनी नजर रखें, क्योंकि उनकी पॉलिसी ही तय करेगी कि ग्लोबल लिक्विडिटी कैसी रहेगी और एसेट प्राइसेज में कितनी वोलेटिलिटी आएगी।
