US National Debt: अमेरिकी कर्ज का पहाड़ **$40 ट्रिलियन** के पार, ब्याज चुकाने में ही जा रहा बजट

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
US National Debt: अमेरिकी कर्ज का पहाड़ **$40 ट्रिलियन** के पार, ब्याज चुकाने में ही जा रहा बजट

अमेरिका पर कर्ज का बोझ ऐतिहासिक स्तर **$40 ट्रिलियन** पर पहुंच गया है, जिसमें सालाना ब्याज का भुगतान ही **$1.1 ट्रिलियन** हो गया है। यह वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट्स के लिए चिंता का विषय है।

अगस्त 2026 में अमेरिका ने एक चिंताजनक आर्थिक पड़ाव पार कर लिया है, जहां उसका राष्ट्रीय कर्ज $40 ट्रिलियन के आंकड़े को पार कर गया है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2026 फाइनेंशियल ईयर के लिए बजट घाटा $2 ट्रिलियन अनुमानित है, जो कि देश की GDP का लगभग 6.2% है।

ब्याज का बढ़ता बोझ

अमेरिकी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती कर्ज पर चुकाया जाने वाला ब्याज है। नेट इंटरेस्ट पेमेंट रिकॉर्ड $1.1 ट्रिलियन तक पहुंच गया है, जो GDP का 3.4% है। यह अब फेडरल बजट का दूसरा सबसे बड़ा खर्च बन चुका है। पहले की तुलना में, अब सरकार को इंफ्रास्ट्रक्चर या सोशल प्रोग्राम्स के बजाय अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा कर्ज चुकाने में खर्च करना पड़ रहा है।

आधिकारिक रुख बनाम बाजार की शंका

ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट का मानना है कि अमेरिका अपनी ग्रोथ के जरिए इस कर्ज से बाहर निकल सकता है। सरकार की रणनीति नई टेक्नोलॉजी और प्रोडक्टिविटी पर टिकी है। हालांकि, मार्केट एक्सपर्ट्स इस पर संशय में हैं। जानकारों का कहना है कि सिर्फ ग्रोथ काफी नहीं है; सरकार को खर्च में कटौती या बड़े रेवेन्यू रिफॉर्म्स की सख्त जरूरत है।

भारतीय निवेशकों पर असर

भारतीय बाजार के लिए यह स्थिति महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका सीधा असर ग्लोबल कैपिटल फ्लो पर पड़ता है। जब अमेरिका ज्यादा कर्ज लेता है, तो बॉन्ड यील्ड (Bond Yield) में बढ़ोतरी होती है। इससे पैसा इमर्जिंग मार्केट्स से निकलकर डॉलर की ओर भागता है, जो FII फ्लो को प्रभावित कर सकता है और रुपये की चाल को भी बिगाड़ सकता है। इसके अलावा, ईरान जैसे देशों के साथ चल रहे जियोपॉलिटिकल तनाव के कारण एनर्जी प्राइसेस में उछाल आने का खतरा बना हुआ है, जो दुनिया भर में महंगाई और उधार की लागत को और बढ़ा सकता है।

आगे क्या होगा?

अगले क्वार्टर में निवेशकों की नजर इस बात पर होगी कि क्या अमेरिकी सरकार फिस्कल पॉलिसी में कोई बड़ा बदलाव करती है। अगर बॉन्ड मार्केट ने अधिक प्रीमियम की मांग की, तो वैश्विक बाजारों में भारी वोलेटिलिटी (Volatility) देखने को मिल सकती है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.