2026 के US मिडटर्म चुनावों से पहले Reuters/Ipsos के सर्वे में **48%** अमेरिकियों ने महंगाई को अपनी सबसे बड़ी चिंता बताया है। निवेशकों के लिए यह संकेत है कि अमेरिका की आगामी फिस्कल पॉलिसी और एनर्जी आउटलुक में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं, जिसका असर ग्लोबल मार्केट पर पड़ना तय है।
आर्थिक चिंताएं और वोटर्स का मूड
3 नवंबर, 2026 को हुए इन चुनावों में घरेलू आर्थिक चिंताएं केंद्र में रहीं। 29 अक्टूबर से 2 नवंबर के बीच किए गए पोल में 48% वोटर्स ने माना कि बढ़ती जीवन लागत (Cost of Living) उनके लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है। यह नाराजगी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के जनवरी 2025 के कार्यकाल की शुरुआत के बाद से बनी आर्थिक अनिश्चितता को दर्शाती है। दिलचस्प बात यह है कि 55% मतदाता ईरान के साथ जारी सैन्य संघर्ष पर होने वाले खर्च से भी नाखुश हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि इसका सीधा असर ईंधन की कीमतों और महंगाई पर पड़ रहा है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्यों है अहम?
अमेरिका में सत्ता का संतुलन बदलने का मतलब है वहां की फिस्कल पॉलिसी में बड़ा बदलाव। भारतीय बाजार के लिहाज से इसके कुछ मुख्य पहलू हैं:
- आईटी और फार्मा सेक्टर: अमेरिकी नीतियों और ट्रेड रेगुलेशन में बदलाव का सीधा असर भारत के इन एक्सपोर्ट-आधारित सेक्टर्स पर पड़ता है।
- क्रूड ऑयल और महंगाई: यदि अमेरिका अपनी एनर्जी पॉलिसी बदलता है, तो इसका असर वैश्विक कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों पर होगा, जो भारतीय ऑयल-मार्केटिंग कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित कर सकता है।
- FII फ्लो: अमेरिका के टैक्स स्ट्रक्चर और सरकारी खर्च में बदलाव से विदेशी निवेशकों (FIIs) का पैसा उभरते बाजारों से वापस जा सकता है या आ सकता है।
इतिहास गवाह है कि अमेरिकी चुनावों के दौरान मार्केट में थोड़े समय के लिए अस्थिरता आती है, लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद स्थितियां सामान्य हो जाती हैं। हालांकि, इस बार बाजार की नजरें अमेरिका के सरकारी खर्च और बजट की दिशा पर टिकी होंगी, क्योंकि यही आने वाले समय में ग्लोबल इंटरेस्ट रेट्स और करेंसी की वैल्यू तय करेंगे।
