2026 के US मिडटर्म चुनावों में कांग्रेस पर डेमोक्रेटिक पार्टी के नियंत्रण ने भारत-अमेरिका ट्रेड पॉलिसी को लेकर नई उम्मीदें जगा दी हैं। हालांकि टैरिफ का खतरा कम हो सकता है, लेकिन फार्मा और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर पर अभी भी नजर रखने की जरूरत है।
हाल ही में संपन्न हुए US मिडटर्म चुनाव नतीजों में डेमोक्रेटिक पार्टी ने हाउस और सीनेट दोनों पर अपना कब्जा जमा लिया है। इस राजनीतिक उलटफेर के बाद भारतीय शेयर बाजार में भी उत्साह दिखा, क्योंकि निवेशक इसे ट्रेड पॉलिसी में स्थिरता के तौर पर देख रहे हैं।
क्या टैरिफ का खतरा टला?
Emkay Research का मानना है कि नई राजनीतिक स्थिति में सरकार का फोकस कंज्यूमर अफोर्डेबिलिटी पर रहेगा। इससे आक्रामक और ब्रॉड-बेस्ड टैरिफ हाइक की संभावना कम हो सकती है, क्योंकि 2028 के इलेक्शन से पहले एडमिनिस्ट्रेशन मतदाताओं को नाराज करने वाला कोई भी बड़ा कदम उठाने से बचेगा।
जानकारों की अलग राय
Global Trade Research Initiative (GTRI) के विशेषज्ञों का नजरिया थोड़ा अलग है। उनके अनुसार, अगर अमेरिका को रूस, चीन या ईरान जैसे देशों के साथ कूटनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, तो सरकार ट्रेड पॉलिसी को 'क्विक विन्स' के लिए एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर सकती है।
कानूनी अड़चनें और निवेश के मायने
US की अदालती फैसलों ने अब सरकार के लिए एकतरफा टैरिफ लगाना कठिन बना दिया है। भविष्य में कोई भी नया ट्रेड बैरियर Section 301 और Section 232 जैसी सख्त प्रक्रियाओं के जरिए ही आएगा, जिसमें पब्लिक स्क्रूटनी और एविडेंस का होना जरूरी है।
निवेशकों के लिए सलाह है कि वे केवल हेडलाइंस पर भरोसा न करें। फार्मा और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर में अभी भी कड़ी कंप्लायंस की जरूरत हो सकती है। आने वाले महीनों में द्विपक्षीय बातचीत (bilateral trade talks) की प्रगति और ऑफिशियल स्टेटमेंट ही सही दिशा तय करेंगे।
