3 नवंबर 2026 को होने वाले US मिड-टर्म चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स पर कब्जा करने के संकेत मिल रहे हैं। यह 'पॉलिटिकल ग्रिडलॉक' भारतीय बाजारों के लिए US बॉन्ड यील्ड और विदेशी निवेश के मोर्चे पर नई चुनौतियां खड़ी कर सकता है।
क्या है 'पॉलिटिकल ग्रिडलॉक' का रिस्क?
अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को होने वाले इन चुनावों पर पूरी दुनिया की नजर है। अगर डेमोक्रेटिक पार्टी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में बहुमत हासिल कर लेती है, तो वहां 'डिवाइडेड गवर्नमेंट' की स्थिति पैदा हो जाएगी। इसका मतलब है कि व्हाइट हाउस और कांग्रेस (संसद) अलग-अलग पार्टियों के हाथ में होंगे। फाइनेंस मार्केट की भाषा में इसे 'पॉलिटिकल ग्रिडलॉक' कहते हैं, जहां नए कानूनों को पारित करना या बजट को मंजूरी देना बेहद मुश्किल हो जाता है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्यों है अहम?
फिलहाल अमेरिका का कुल राष्ट्रीय कर्ज $40 ट्रिलियन के करीब है, जबकि उधारी की सीमा $41.1 ट्रिलियन है। अगर सरकार फंडिंग और कर्ज की सीमा पर गतिरोध बढ़ता है, तो इसका असर सीधे ग्लोबल लिक्विडिटी पर पड़ेगा।
भारतीय निवेशकों के लिए इसके मुख्य संकेत:
- FII सेंटीमेंट: वाशिंगटन में अनिश्चितता बढ़ने पर US ट्रेजरी यील्ड में उछाल आ सकता है, जिससे विदेशी निवेशक भारत जैसे उभरते बाजारों से पैसा निकाल सकते हैं।
- करेंसी प्रेशर: इस हलचल का असर रुपये (USD-INR) की चाल पर भी पड़ सकता है।
- बॉन्ड मार्केट: साल 2027 में डेट सीलिंग को लेकर होने वाली संभावित बहस से बॉन्ड मार्केट में अस्थिरता बढ़ सकती है।
निवेशकों को अब आने वाले हफ्तों में चुनावी नतीजों और वहां की विधायी बातचीत के रुख पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए। विशेष रूप से 10-year US Treasury Yield में होने वाली हलचल ग्लोबल रिस्क ऐपेटाइट का सबसे बड़ा पैमाना होगी।
