अमेरिकी बाजार में S&P 500 का CAPE रेशियो **41.2** पर पहुंच गया है, जो 'डॉट-कॉम बबल' की याद दिलाता है। जहां भारत के लार्ज-कैप स्टॉक्स संतुलित दिख रहे हैं, वहीं Nifty Smallcap 250 अपने 5 साल के मीडियन से **20%** प्रीमियम पर ट्रेड कर रहा है, जो छोटे शेयरों में बड़े जोखिम का संकेत है।
अमेरिका में बढ़ा वैल्यूएशन का खतरा
अमेरिकी शेयर बाजार फिलहाल उन वैल्युएशन स्तरों पर है, जो साल 1999 के डॉट-कॉम बबल के बाद पहली बार देखने को मिले हैं। S&P 500 का CAPE (Cyclically Adjusted Price-to-Earnings) रेशियो लगभग 41.2 के खतरनाक स्तर पर है। यह इंडिकेटर बताता है कि निवेशक भविष्य की कमाई के लिए बहुत ऊंची कीमत चुका रहे हैं, जो अक्सर बाजार में बड़ी गिरावट या वोलेटिलिटी का संकेत होता है।
भारतीय निवेशकों के लिए चिंता इसलिए है क्योंकि अमेरिकी बाजारों में हलचल का सीधा असर ग्लोबल लिक्विडिटी पर पड़ता है। अगर अमेरिका में ब्याज दरों या जियो-पॉलिटिकल हालातों में कोई बड़ा बदलाव आता है, तो उभरते बाजारों (Emerging Markets) जैसे भारत में उतार-चढ़ाव बढ़ना तय है। हालांकि, अच्छी बात यह है कि भारतीय बाजार अभी अपने 2007 के ऐतिहासिक हाई की तुलना में काफी संतुलित स्थिति में है।
स्मॉल-कैप में क्यों बढ़ रहा रिस्क?
भारतीय लार्ज-कैप इंडेक्स जहां स्थिर दिख रहे हैं, वहीं स्मॉल-कैप सेगमेंट में ओवर-वैल्युएशन की समस्या साफ नजर आ रही है। Nifty Smallcap 250 का P/E मल्टीपल अभी 33.9 के आसपास है, जो इसके 5 साल के मीडियन यानी 28.3 से करीब 20% ज्यादा है। इसका मतलब है कि स्मॉल-कैप कंपनियां फिलहाल अपनी असल कमाई के बजाय केवल सेंटीमेंट के दम पर भाग रही हैं।
निवेशकों के लिए सलाह
मौजूदा बाजार में बड़ा क्रैश आने के आसार कम हैं, लेकिन जिन सेक्टर्स में तेजी बहुत तेज रही है, वहां करेक्शन की गुंजाइश बनी हुई है। निवेशकों को US ट्रेजरी यील्ड, फेडरल रिजर्व की पॉलिसी और ग्लोबल हालात पर बारीक नजर रखनी चाहिए। पोर्टफोलियो में वैसी ही कंपनियों को रखें जिनकी फंडामेंटल्स मजबूत हैं और जिन पर कर्ज का बोझ कम है, ताकि बाजार में आने वाले किसी भी झटके को आसानी से झेला जा सके।
