सितंबर में US मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में मजबूती देखी गई है और PMI **54.5** पर रहा है। हालांकि, भू-राजनीतिक तनाव और एनर्जी की बढ़ती कीमतों के कारण इनपुट लागत में उछाल आया है, जो ग्लोबल मार्केट और भारतीय निवेशकों के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने सितंबर में अपनी गति बरकरार रखी है। इंस्टिट्यूट फॉर सप्लाई मैनेजमेंट (ISM) की रिपोर्ट के मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग PMI 54.5 रहा, जो सेक्टर में लगातार विस्तार को दर्शाता है। इस तेजी के पीछे AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च और घरेलू डिमांड मुख्य कारण रहे हैं।
बढ़ती लागत और सप्लाई चेन का दबाव
उत्पादन का स्तर बेहतर होने के बावजूद, कंपनियों के लिए चुनौतियां कम नहीं हैं। ISM के 'प्राइसेज पेड' (Prices Paid) इंडेक्स में भारी उछाल आया है, जो अगस्त के 71.1 से बढ़कर सितंबर में 77.9 पर पहुंच गया। कंपनियों के मुताबिक, ईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच जारी भू-राजनीतिक तनाव के चलते फ्यूल और लॉजिस्टिक्स की लागत में तेजी आई है, जिससे कच्चे माल और एनर्जी का खर्च बढ़ गया है।
रोजगार के मोर्चे पर राहत
एक सकारात्मक संकेत यह है कि सेक्टर में नई भर्तियों का सिलसिला जारी है। एंप्लॉयमेंट इंडेक्स 51.2 से बढ़कर 52.7 पर पहुंच गया है, जिससे साफ है कि कंपनियां अपने पेंडिंग ऑर्डर्स को पूरा करने के लिए मैनपावर बढ़ा रही हैं।
भारतीय निवेशकों के लिए क्यों है जरूरी?
यह डेटा सीधे तौर पर भारतीय बाजारों को प्रभावित कर सकता है:
- क्रूड ऑयल बिल: भारत कच्चा तेल बड़े पैमाने पर आयात करता है। वैश्विक स्तर पर एनर्जी की कीमतें बढ़ने से भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ेगा, जो रुपये की चाल पर दबाव डाल सकता है।
- US फेडरल रिजर्व का रुख: अगर इनपुट लागत बढ़ने से अमेरिका में महंगाई (Inflation) और ज्यादा समय तक बनी रहती है, तो US फेडरल रिजर्व इंटरेस्ट रेट्स को लंबे समय तक ऊंचा रख सकता है। इससे FII (विदेशी निवेशकों) का पैसा इमर्जिंग मार्केट्स से निकलकर डॉलर की ओर शिफ्ट हो सकता है, जो भारतीय शेयर बाजार के लिए नकारात्मक संकेत है।
