अमेरिका के लिए जुलाई का महीना आर्थिक मोर्चे पर चिंताजनक रहा। देश का फेडरल बजट डेफिसिट (Budget Deficit) जुलाई **2026** में एक नया रिकॉर्ड बनाते हुए **$432 बिलियन** तक पहुंच गया। सरकारी खर्च में बढ़ोतरी और भारी-भरकम टैरिफ रिफंड (Tariff Refunds) इसके मुख्य कारण रहे। इस वित्तीय वर्ष (Fiscal Year) में अब तक का कुल घाटा **$1.799 ट्रिलियन** हो चुका है, जो पिछले पूरे साल के घाटे से भी ज़्यादा है। बढ़ता राष्ट्रीय कर्ज (National Debt) वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
खर्च में बेतहाशा बढ़ोतरी और सरकारी खजाने पर बोझ
जुलाई में अमेरिका का कुल सरकारी खर्च (Outlays) $766 बिलियन रहा, जो पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 22% ज़्यादा है। इस बढ़ोतरी के पीछे कैलेंडर की टाइमिंग का भी असर रहा। दरअसल, अगस्त में देय होने वाले लगभग $99 बिलियन के भुगतानों को जुलाई में ही कर दिया गया, क्योंकि महीने की पहली तारीख वीकेंड पर पड़ रही थी।
इस कैलेंडर एडजस्टमेंट को हटा भी दें, तो भी खर्च का स्तर ऊंचा बना हुआ है। बढ़ते हुए मेडिकल खर्च (Medicare) और राष्ट्रीय कर्ज पर चुकाए जाने वाले ब्याज (Interest Payments) इस बढ़ोतरी के मुख्य कारण हैं। चालू वित्तीय वर्ष के पहले दस महीनों में, सिर्फ ब्याज के तौर पर $1.17 ट्रिलियन का भुगतान किया गया है। यह दिखाता है कि $39.9 ट्रिलियन के करीब पहुंच चुके राष्ट्रीय कर्ज का बोझ कितना बढ़ गया है।
टैरिफ रिफंड का राजस्व पर असर
जुलाई में सरकारी आय (Receipts) घटकर $334 बिलियन रह गई। इस गिरावट की एक बड़ी वजह कस्टम ड्यूटी से होने वाली आय में भारी कमी रही। टैरिफ रिफंड के चलते, कस्टम ड्यूटी से होने वाली नेट आय निगेटिव हो गई और यह $8.55 बिलियन पर आ गई। सरकार ने लगभग $33.38 बिलियन के टैरिफ रिफंड जारी किए।
ये रिफंड पुराने टैरिफ स्ट्रक्चर से जुड़े कानूनी फैसलों का नतीजा हैं। हालांकि सरकार प्रमुख व्यापारिक देशों से आने वाले सामानों पर नए ड्यूटी फ्रेमवर्क लागू कर रही है, लेकिन कस्टम आय में यह अस्थिरता मासिक वित्तीय आंकड़ों में उतार-चढ़ाव पैदा कर रही है। US Customs and Border Protection ने जुलाई तक ऐसे लगभग $100 बिलियन के रिफंड प्रोसेस किए हैं, जिसने मासिक ट्रेजरी बैलेंस पर सीधा असर डाला है।
निवेशकों के लिए क्यों है यह अहम?
अमेरिका के बजट घाटे में लगातार हो रही बढ़ोतरी का असर वैश्विक वित्तीय बाजारों पर पड़ सकता है। बढ़ते घाटे का मतलब है कि US Treasury को ज़्यादा उधार लेना पड़ेगा, जिसका असर सरकारी बॉन्ड यील्ड (Bond Yields) पर पड़ सकता है। जब बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो इसका दबाव वैश्विक इक्विटी मार्केट्स (Equity Markets) और करेंसी वैल्यूएशन (Currency Valuations) पर भी पड़ता है, जिसमें भारतीय रुपया भी शामिल है।
निवेशकों के लिए यह देखना ज़रूरी होगा कि क्या सरकार इस वित्तीय दिशा को लंबे समय तक बनाए रख सकती है। राष्ट्रीय कर्ज पर ब्याज का खर्च पहले ही $1 ट्रिलियन के पार जा चुका है। ऐसे में, यह देखना अहम होगा कि सरकार उधार लेने की लागत को और बढ़ाए बिना वित्तीय स्वास्थ्य को कैसे प्रबंधित करती है। यह आने वाले महीनों में अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विश्लेषकों के लिए एक बड़ा मुद्दा रहेगा।
