U.S.-Iran संघर्ष को 6 महीने हो चुके हैं और अब अमेरिका ने 'Operation Economic Outcast' के जरिए कूटनीति बदली है। भारतीय निवेशकों के लिए क्रूड ऑयल का **$90** प्रति बैरल के पास बना रहना और FII का आउटफ्लो बड़ी चिंता का विषय है।
फरवरी 2026 में शुरू हुए U.S. और Iran के बीच संघर्ष ने अब एक लंबे गतिरोध का रूप ले लिया है। शुरुआती सैन्य हमलों के बावजूद, अमेरिका अपने रणनीतिक लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाया है। अब वाशिंगटन ने अपनी रणनीति बदलते हुए 'Operation Economic Outcast' के तहत सख्त प्रतिबंधों पर ध्यान केंद्रित किया है।\n\n### निवेशकों के लिए चुनौतियां\n\nहोर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर ईरान के नियंत्रण ने वैश्विक एनर्जी सप्लाई चेन को कमजोर बनाए रखा है। क्रूड ऑयल की कीमतें $90 के आसपास बनी हुई हैं, जो भारत जैसे एनर्जी इंपोर्ट करने वाले देशों के लिए महंगाई का दबाव पैदा कर रही हैं। \n\nनिवेशकों को मुख्य रूप से तीन जोखिमों पर नजर रखनी चाहिए:\n\n1. मार्केट वॉलेटिलिटी: भू-राजनीतिक अनिश्चितता के कारण FII भारतीय बाजार से अपना पैसा निकाल सकते हैं, जिससे इक्विटी बाजार में बिकवाली का दबाव बढ़ सकता है।\n2. महंगाई और मार्जिन: तेल की ऊंची कीमतों से ऑयल-मार्केटिंग कंपनियों और केमिकल मैन्युफैक्चरर्स के प्रॉफिट मार्जिन पर सीधा असर पड़ रहा है।\n3. इंटरेस्ट रेट: यदि ऊर्जा के कारण महंगाई लंबे समय तक ऊंची रहती है, तो सेंट्रल बैंक ब्याज दरों में कटौती में देरी कर सकते हैं, जिससे लिक्विडिटी प्रभावित होगी।\n\n### अमेरिकी राजनीति का असर\n\nयह संघर्ष अब अमेरिकी घरेलू राजनीति का भी अहम मुद्दा बन चुका है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग गिरकर 33% के निचले स्तर पर आ गई है। नवंबर 2026 में होने वाले मिड-टर्म चुनावों से पहले, इस स्थिति को संभालने का दबाव अमेरिका पर और बढ़ गया है। सैन्य खर्च बढ़ने से वहां की अर्थव्यवस्था पर भी बोझ पड़ रहा है, जिस पर दुनिया भर के निवेशकों की पैनी नजर है।
