रूस से क्रूड ऑयल आयात पर **100%** टैरिफ लगाने वाला विवादास्पद अमेरिकी बिल फिलहाल ठंडे बस्ते में चला गया है। अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने नवंबर चुनाव तक इस पर कोई भी फैसला लेने से इनकार कर दिया है, जिससे भारत को बड़ी राहत मिली है।
बिल पर लगी ब्रेक
'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' को अमेरिकी सीनेट में तो भारी समर्थन मिला था, लेकिन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने 3 नवंबर के मिड-टर्म चुनावों तक इसे आगे बढ़ाने से साफ मना कर दिया है। यह बिल अमेरिकी प्रशासन को रूस से कच्चा तेल और नेचुरल गैस आयात करने वाले दुनिया के शीर्ष 5 देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने वाला था।
भारत के लिए क्या हैं मायने?
भारत की एनर्जी रणनीति काफी हद तक रियायती रूसी तेल पर टिकी है। वित्त वर्ष 2026 में भारत ने रूस से $40.8 अरब का क्रूड ऑयल आयात किया, जो भारत के कुल तेल आयात का 30% से ज्यादा है। यदि यह बिल पास हो जाता, तो भारत को अपने सोर्सिंग में अचानक बदलाव करना पड़ता, जिससे महंगाई और आयात बिल दोनों का दबाव बढ़ सकता था।
क्यों टला यह बिल?
स्पीकर माइक जॉनसन समेत कई अमेरिकी नेता इस बिल को लेकर उलझन में हैं। उनका मानना है कि इतनी कड़ी कार्रवाई से ग्लोबल एनर्जी मार्केट में भारी अस्थिरता पैदा हो सकती है, जिसका असर खुद अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
विदेश मंत्री का रुख
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया है कि रूस से तेल की खरीद कोई राजनीतिक गठबंधन नहीं, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा की जरूरत है। भारत सरकार का मुख्य लक्ष्य अपने 1.4 अरब नागरिकों को सस्ती और सुलभ ऊर्जा मुहैया कराना है। हालांकि, निवेशक अभी सतर्क रहें, क्योंकि चुनाव के बाद इस बिल पर फिर से हलचल मच सकती है।
