ग्लोबल मार्केट से राहत भरी खबर आ रही है। क्रूड ऑयल की कीमतों में गिरावट के बाद US स्टॉक फ्यूचर्स में रिकवरी दिखी है। हालांकि, फेड रिजर्व की बैठक और बढ़ती ट्रेजरी यील्ड के बीच निवेशक अभी भी फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं।
शुक्रवार, 11 सितंबर 2026 को ग्लोबल मार्केट्स में एक बार फिर सुधार की कोशिश हो रही है। एनर्जी कॉस्ट में आ रही कमी के कारण US स्टॉक इंडेक्स फ्यूचर्स हरे निशान में कारोबार करते दिखे। कच्चे तेल की बात करें तो Brent Crude $104 के स्तर पर आ गया है, जबकि West Texas Intermediate (WTI) महत्वपूर्ण साइकोलॉजिकल लेवल $100 प्रति बैरल के नीचे फिसल गया है। इस गिरावट की मुख्य वजह होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में संभावित कूटनीतिक बातचीत और ग्लोबल डिमांड को लेकर चिंताएं हैं।
बाजार पर दबाव क्यों है?
एनर्जी कीमतों में राहत के बावजूद, इकोनॉमी का मिजाज अभी भी जटिल बना हुआ है। US 10-year Treasury Yield फिलहाल 4.94% के आसपास मंडरा रही है। निवेशकों के लिए यह आंकड़ा बेहद अहम है, क्योंकि यह स्तर 5% के करीब पहुंचने पर इक्विटी जैसे रिस्की एसेट्स की चमक कम हो जाती है। बाजार की नजर अब कंज्यूमर इन्फ्लेशन डेटा पर है, जो फेडरल रिजर्व के अगले कदम को तय करेगा। उम्मीद जताई जा रही है कि 15-16 सितंबर की बैठक में फेड ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है, जिसकी संभावना करीब 70% मानी जा रही है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्या मायने हैं?
भारत के लिए क्रूड ऑयल का सस्ता होना एक बड़ा पॉजिटिव फैक्टर है। हम तेल के बड़े आयातक हैं, इसलिए कीमतों में गिरावट से करंट अकाउंट डेफिसिट पर दबाव कम होता है और घरेलू महंगाई को काबू में रखने में मदद मिलती है। हालांकि, हाई ऑयल प्राइसेज का असर पेंट्स, केमिकल्स और लॉजिस्टिक्स जैसे सेक्टरों के प्रॉफिट मार्जिन पर भी पड़ता है।
इसके अलावा, US ट्रेजरी यील्ड और FII फ्लो का सीधा कनेक्शन है। जब यील्ड बढ़ती है, तो डॉलर मजबूत होता है और भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट्स से विदेशी पैसा बाहर जाने का डर बना रहता है, जिसका सीधा असर भारतीय रुपये पर पड़ता है। हालांकि, Oracle जैसे क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर दिग्गजों के बेहतर नतीजों ने बाजार में उम्मीद की एक किरण जगाई है। अब सारा दारोमदार फेड की कमेंट्री पर है कि क्या वे रेट-हाइक साइकिल के अंत का संकेत देते हैं या नहीं।
