US Federal Reserve: क्या अब डॉलर का इस्तेमाल होगा पॉलिटिकल टूल की तरह? फेड की स्वायत्तता पर मंडराया संकट

ECONOMY
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AuthorAditi Chauhan|Published at:
US Federal Reserve: क्या अब डॉलर का इस्तेमाल होगा पॉलिटिकल टूल की तरह? फेड की स्वायत्तता पर मंडराया संकट

US Federal Reserve पर अब डॉलर स्वैप लाइन्स को भू-राजनीतिक (geopolitical) उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने का दबाव बढ़ रहा है। अमेरिका में महंगाई **3.7%** पर है और ट्रेजरी के साथ बढ़ते तालमेल ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है कि कहीं यह डॉलर की वैश्विक साख को नुकसान न पहुंचा दे।

अमेरिकी फेडरल रिजर्व इस समय एक गंभीर दुविधा में है। एक तरफ उसे घरेलू स्तर पर कीमतों में स्थिरता बनाए रखनी है, तो दूसरी तरफ उस पर डॉलर को 'स्टेटक्राफ्ट' (statecraft) यानी विदेशी नीति का हथियार बनाने का दबाव है। जैक्सन होल संगोष्ठी में फेड चेयर केविन वॉर्श के बयानों से साफ है कि अब चर्चा केवल मॉनेटरी पॉलिसी तक सीमित नहीं है, बल्कि फेड की लिक्विडिटी टूल्स और अमेरिकी विदेश नीति के बीच के बढ़ते घालमेल पर है।

स्वैप लाइन्स और बढ़ते सवाल

विवाद की जड़ में फेड की 'करेंसी स्वैप लाइन्स' हैं। इनका इस्तेमाल ऐतिहासिक रूप से 2008 जैसे वित्तीय संकट के दौरान बाजारों को स्थिर करने के लिए किया जाता था। लेकिन अब बहस इस बात पर छिड़ी है कि क्या इन सुविधाओं का उपयोग राजनीतिक सहयोगियों को समर्थन देने या किसी देश के प्रभाव को काउंटर करने के लिए किया जा रहा है। यह स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब देश की महंगाई दर 3.7% (जुलाई PCE इंडेक्स) पर बनी हुई है, जिससे FOMC पर ब्याज दरों को 3.50%-3.75% की रेंज में मैनेज करने का भारी दबाव है।

ट्रेजरी और फेड का बढ़ता तालमेल

बाजार के जानकारों का कहना है कि फेड और अमेरिकी ट्रेजरी की बढ़ती सांठगांठ ने मॉनेटरी पॉलिसी और फिस्कल पॉलिसी के बीच की लकीर को धुंधला कर दिया है। ट्रेजरी का लॉन्ग-टर्म सरकारी कर्ज के बायबैक को बढ़ाने का निर्णय यह डर पैदा कर रहा है कि कहीं फेड एक स्वतंत्र संस्था के बजाय राजनीतिक रणनीति का हिस्सा न बन जाए। अगर ऐसा होता है, तो वैश्विक रिजर्व करेंसी के रूप में डॉलर की विश्वसनीयता पर सवाल उठना तय है।

भारतीय बाजार पर क्या होगा असर?

भारत जैसे उभरते बाजारों के लिए यह चिंता की बात है। अगर डॉलर का इस्तेमाल वित्तीय हथियार की तरह किया जाता है, तो दूसरे देश डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश करेंगे, जिससे करेंसी बाजारों में अस्थिरता और पूंजी प्रवाह (capital flows) पर बुरा असर पड़ सकता है। निवेशकों की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि फेड अपनी ऑपरेशनल इंडिपेंडेंस को कैसे बरकरार रखता है और क्या वह ट्रेजरी के साथ अपनी गतिविधियों को अलग रखने में कामयाब होता है।

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