अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने सार्वजनिक रूप से ब्याज दरें घटाने की मांग की है, लेकिन देश में महंगाई **3.4%** पर बनी हुई है। 15-16 सितंबर को होने वाली फेडरल रिजर्व की बैठक से पहले ट्रेडर्स **86%** संभावना जता रहे हैं कि ब्याज दरें बढ़ाई जाएंगी।
केविन वॉर्श के नेतृत्व में फेडरल रिजर्व अपनी महत्वपूर्ण पॉलिसी मीटिंग के लिए तैयार है। राष्ट्रपति Donald Trump का तर्क है कि विकास को बढ़ावा देने के लिए ब्याज दरों में कटौती जरूरी है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। अगस्त के आंकड़े बताते हैं कि महंगाई 3.4% पर अटकी हुई है, जो फेड के 2% के लॉन्ग-टर्म टारगेट से काफी ऊपर है।
बाजार की उम्मीदें और व्हाइट हाउस का स्टैंड
व्हाइट हाउस और सेंट्रल बैंक के बीच चल रहे इस टकराव पर दुनिया भर के निवेशकों की नजर है। फिलहाल मार्केट में 86% अनुमान लगाया जा रहा है कि इस मीटिंग में 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी हो सकती है। महंगाई को काबू में रखना फेड की प्राथमिकता है, खासकर तब जब हाउसिंग, ग्रोसरी और जरूरी सेवाओं की कीमतें आसमान छू रही हैं।
सप्लाई शॉक और एनर्जी क्राइसिस
महंगाई का एक बड़ा कारण अमेरिकी सीमाओं से बाहर है। U.S.-Iran संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में सप्लाई बाधित हुई है, जिससे कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार बनी हुई हैं। यह एनर्जी कॉस्ट सीधे तौर पर कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) को प्रभावित कर रही है, जिससे फेड के लिए फैसले लेना और भी मुश्किल हो गया है।
क्या हैं आर्थिक जोखिम?
प्रशासन ने संकेत दिया है कि अगर घरेलू स्तर पर कर्ज सस्ता नहीं हुआ, तो वे ट्रेड रिस्ट्रिक्शंस का सहारा ले सकते हैं। यह भू-राजनीतिक अनिश्चितता ग्लोबल मार्केट्स में भारी उतार-चढ़ाव (Volatility) पैदा कर सकती है। भारतीय निवेशकों के लिए भी यह बैठक बेहद जरूरी है, क्योंकि फेड का कोई भी 'हॉकिश' स्टैंड भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट्स में कैपिटल फ्लो और करेंसी को प्रभावित कर सकता है।
