अमेरिका ने H-1B वीजा स्पॉन्सर करने वाले नियोक्ताओं के लिए **$1,00,000** की भारी-भरकम फीस को एक साल और बढ़ा दिया है। इसके साथ ही, रूस-ईरान प्रतिबंध कानून के चलते भारतीय IT कंपनियों और तेल आयातकों के लिए नई चुनौतियां पैदा हो गई हैं।
IT सेक्टर पर पड़ेगा दबाव
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा H-1B वीजा फीस को $1,00,000 पर बरकरार रखने से भारतीय IT सेक्टर की मुश्किलें बढ़ गई हैं। Tata Consultancy Services, Infosys, और HCL Technologies जैसी बड़ी कंपनियां अपने प्रोजेक्ट्स के लिए बड़े पैमाने पर इन वीजा पर निर्भर रहती हैं। यदि कंपनियां इस अतिरिक्त खर्च को खुद उठाती हैं, तो उनके नेट प्रॉफिट मार्जिन पर सीधा असर पड़ेगा। वहीं, लागत ग्राहकों पर डालने से ग्लोबल मार्केट में उनकी कॉम्पिटिटिवनेस प्रभावित हो सकती है। अब निवेशक इन कंपनियों के अगले क्वार्टरली नतीजों में मैनेजमेंट की कमेंट्री पर नजर रखेंगे कि वे कैसे लोकल हायरिंग या ऑटोमेशन के जरिए इस खर्च को मैनेज करेंगे।
एनर्जी सेक्टर के लिए जोखिम
वहीं, व्हाइट हाउस द्वारा 'सेंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट' पर हस्ताक्षर करने के बाद एनर्जी सेक्टर में हलचल है। चूंकि भारत रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल का आयात कर रहा है, इसलिए अमेरिका द्वारा उन देशों पर लेवी लगाने से सप्लाई चेन बिगड़ सकती है। Indian Oil Corporation (IOCL), Bharat Petroleum (BPCL) और HPCL जैसी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को अब महंगे विकल्पों की तलाश करनी पड़ सकती है, जिससे उनके ऑपरेशनल खर्च में बढ़ोतरी तय है। यह स्थिति भारतीय इंडस्ट्री के लिए भू-राजनीतिक स्तर पर बड़ा सिरदर्द बन गई है।
