नवंबर 2026 के मिडटर्म चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी के सत्ता में आने के बावजूद H-1B वीजा नियमों में बड़ी राहत के आसार नहीं हैं। अधिकांश प्रतिबंध प्रशासनिक आदेशों से चलते हैं, इसलिए भारतीय IT सेक्टर अब पूरी तरह से स्थानीय भर्ती (local hiring) पर फोकस बढ़ा रहा है।
प्रशासनिक मोर्चे पर चुनौतियां बरकरार
नवंबर 2026 के मिडटर्म चुनावों के बाद US कांग्रेस में डेमोक्रेट्स का दबदबा बढ़ने के बावजूद H-1B और PERM वीजा नीतियों में तुरंत बदलाव की गुंजाइश कम है। इसकी मुख्य वजह यह है कि मौजूदा वीजा बाधाएं विधायी (legislative) नहीं, बल्कि प्रशासनिक आदेशों और संघीय एजेंसियों के नियमों पर आधारित हैं। कांग्रेस में सत्ता परिवर्तन का इन नियमों पर सीधा असर नहीं पड़ेगा।
वीजा फीस का आर्थिक बोझ
भारतीय पेशेवरों के लिए H-1B लॉटरी सिस्टम और बढ़ी हुई वेज लिमिट (wage thresholds) पहले की तरह ही बनी रहेंगी। सबसे बड़ी चिंता वीजा फीस को लेकर है। चर्चा में चल रही $103,265 की भारी-भरकम सरचार्ज फीस कंपनियों के लिए अनिश्चितता का बड़ा कारण बनी हुई है। हालांकि जून 2026 में कोर्ट ने $100,000 की फीस के एक प्रस्ताव को रोक दिया था, लेकिन भविष्य में ऐसे किसी भी नए प्रशासनिक शुल्क को रोकने के लिए अब लड़ाई अदालतों में ही लड़ी जाएगी।
भारतीय IT सेक्टर का नया दांव
Tata Consultancy Services, Infosys, और Cognizant जैसी प्रमुख भारतीय कंपनियां इस बदली हुई हकीकत को पहले ही भांप चुकी हैं। अपनी प्रॉफिट मार्जिन को सुरक्षित रखने और वीजा से जुड़े कानूनी जोखिमों को कम करने के लिए ये कंपनियां अब अमेरिका में ही स्थानीय स्तर पर भर्ती (local hiring) बढ़ाने पर जोर दे रही हैं। यह रणनीति उन्हें विदेशी वीजा प्रोग्राम्स पर निर्भरता कम करने में मदद करेगी। निवेशकों को अब आगे चलकर कोर्ट के फैसलों और अमेरिकी एजेंसियों के वेज संबंधी अपडेट्स पर नजर रखनी चाहिए, जो इन कंपनियों के कामकाज और मुनाफे की दिशा तय करेंगे।
