US Dollar ने 3 महीने का उच्चतम स्तर छू लिया है। फेडरल रिजर्व के सख्त रुख और बढ़ती ट्रेजरी यील्ड के कारण डॉलर मजबूत हो रहा है, जिसका सीधा असर भारतीय रुपये की कमजोरी और विदेशी निवेश (FII) के रुख पर पड़ सकता है।
डॉलर की मजबूती के पीछे की वजह
सितंबर में डॉलर ने अपनी ताकत का प्रदर्शन करते हुए 3 महीने का उच्चतम स्तर दर्ज किया है। Bloomberg Dollar Spot Index में इस महीने 1.8% की बढ़त देखी गई है, जिसका मुख्य कारण अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में आया उछाल है। 30-वर्षीय ट्रेजरी नोट की यील्ड 2002 के बाद के अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है, जिससे ग्लोबल इन्वेस्टर्स के लिए अमेरिकी एसेट्स ज्यादा आकर्षक बन गए हैं।
फेडरल रिजर्व का सख्त रुख
फेडरल रिजर्व के अधिकारियों, जैसे कि Michael Barr और New York Fed के प्रेसिडेंट John Williams ने साफ संकेत दिए हैं कि महंगाई को काबू में लाने के लिए आगे भी ब्याज दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं। इस सख्त बयानबाजी ने इन्वेस्टर्स के सेंटीमेंट को बदल दिया है, जिससे इमर्जिंग मार्केट्स से पैसा निकलकर डॉलर की ओर जा रहा है।
भारतीय निवेशकों के लिए चिंता?
डॉलर का बढ़ना भारत के लिए कई चुनौतियां लेकर आता है:
- रुपये में कमजोरी: डॉलर मजबूत होने पर रुपया टूटता है, जिससे क्रूड ऑयल जैसे जरूरी इंपोर्ट महंगे हो जाते हैं।
- महंगाई का दबाव: इंपोर्ट महंगा होने से भारत में घरेलू महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है, जिससे RBI की चुनौतियां बढ़ जाती हैं।
- FII की निकासी: जब अमेरिकी सरकारी बॉन्ड्स पर अच्छी यील्ड मिलती है, तो विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) भारतीय बाजार जैसे इमर्जिंग मार्केट्स से अपना पैसा निकालकर अमेरिकी बॉन्ड्स में शिफ्ट कर सकते हैं। इससे Nifty और Sensex में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।
आगे क्या है रडार पर?
तकनीकी तौर पर, डॉलर का RSI इंडिकेटर 70 के पार जा चुका है, जो यह बताता है कि यह 'ओवरबॉट' जोन में है। हालांकि, पूरी दिशा अब आने वाले US इकोनॉमिक डेटा पर टिकी है। इन्वेस्टर्स को US का Personal Consumption Expenditures (PCE) प्राइस इंडेक्स और Non-farm पेरोल रिपोर्ट पर नजर रखनी चाहिए। यदि ये आंकड़े उम्मीद से कमजोर रहते हैं, तो डॉलर की तेजी पर लगाम लग सकती है और उभरते बाजारों को राहत मिल सकती है।
