US Dollar साइकिल के पीक पर पहुंचने के संकेत मिल रहे हैं। इतिहास गवाह है कि जब डॉलर की मजबूती कम होती है, तो ग्लोबल पैसा इमर्जिंग मार्केट्स की ओर दौड़ता है। क्या 2028 तक भारतीय बाजारों में भी बड़ी हलचल देखने को मिलेगी?
OECD के डेटा के मुताबिक, US डॉलर पिछले 25 साल के अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच चुका है। निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि जब डॉलर मजबूत होता है, तो ग्लोबल पैसा इमर्जिंग मार्केट्स से निकलकर अमेरिकी एसेट्स में चला जाता है। लेकिन अगर यह साइकिल अब ठंडा पड़ रहा है, तो भारतीय बाजार की चाल पूरी तरह बदल सकती है।
जब डॉलर की चमक कम होती है, तो विदेशी निवेशक ज्यादा रिटर्न के लिए नए बाजारों की तलाश करते हैं। भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट स्थिर बना हुआ है और रुपया भी ऐतिहासिक मानकों पर अंडरवैल्यूड दिख रहा है, जो भारतीय शेयरों के लिए सकारात्मक संकेत है।
बैंकिंग सेक्टर में वैल्यूएशन का खेल
मार्केट एक्सपर्ट्स की नजरें इस वक्त Nifty Bank पर टिकी हैं। बैंक इंडेक्स अपने प्राइस-टू-बुक रेशियो के लिहाज से काफी निचले स्तर पर कारोबार कर रहा है। हैरानी की बात यह है कि भारत के कई बड़े प्राइवेट बैंक, JP Morgan जैसे ग्लोबल दिग्गजों के मुकाबले सस्ती वैल्यूएशन पर उपलब्ध हैं, जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था की ग्रोथ रेट उनसे कहीं बेहतर है। यह डिस्क्रिपेंसी बताती है कि सेक्टर को जरूरत से ज्यादा सावधानी के साथ देखा जा रहा है।
2028 तक का रास्ता और रिस्क
अमेरिका में AI स्टॉक्स की जबरदस्त हाइप अब थोड़ी धीमी पड़ती दिख रही है। ऐसे में फंड मैनेजर्स अपना पैसा दूसरी मार्केट्स में रोटेट कर सकते हैं, जिससे भारत को बड़ा फायदा होने की उम्मीद है। हालांकि, यह सफर सीधा नहीं होगा।
निवेशकों को याद रखना चाहिए कि क्रूड ऑयल (Crude Oil) की कीमतें भारत के लिए सबसे बड़ा रिस्क फैक्टर हैं। तेल के दाम बढ़ने से रुपया कमजोर हो सकता है और महंगाई बढ़ सकती है। 2028 तक के सफर में कॉर्पोरेट अर्निंग्स, FII फ्लो और ग्लोबल इंटरेस्ट रेट्स ही तय करेंगे कि मार्केट अपनी चाल को रफ्तार देगा या कंसोलिडेशन मोड में रहेगा।
