अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज पहली बार **$40 ट्रिलियन** के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया है। इस भारी भरकम कर्ज के बोझ ने **30-वर्षीय Treasury Yields** को **5.3%** के 19 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंचा दिया है, जिससे वैश्विक बाजारों में हड़कंप मच गया है।
बाजार में मची खलबली
अगस्त 2026 तक अमेरिका का सरकारी कर्ज आधिकारिक रूप से $40 ट्रिलियन का आंकड़ा पार कर चुका है। हाई इन्फ्लेशन और सरकार के बढ़ते खर्चों के कारण 30-वर्षीय US Treasury Bonds की यील्ड 5.3% से ऊपर निकल गई है, जो साल 2007 के बाद का उच्चतम स्तर है। ग्लोबल इन्वेस्टर्स के लिए यह यील्ड 'रिस्क-फ्री' रिटर्न का बेंचमार्क है, और इसमें आया उछाल दुनिया भर में फाइनेंशियल कंडिशन्स को सख्त बना रहा है।
क्यों बढ़ रहा है कर्ज का दबाव?
इस संकट के पीछे दो मुख्य वजहें हैं। पहली, अमेरिकी सरकार की आमदनी से ज्यादा उसका खर्च है, जिसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के कर्ज पर सालाना ब्याज भुगतान अब $1 ट्रिलियन से ज्यादा हो गया है। दूसरी तरफ, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) प्रोजेक्ट्स और डेटा सेंटर बनाने के लिए बड़ी टेक कंपनियां भी भारी कर्ज ले रही हैं। पूंजी की इस दोहरी मांग ने निवेशकों को सरकारी बॉन्ड पर ज्यादा रिटर्न मांगने के लिए मजबूर कर दिया है।
सरकार की कोशिशें और बाजार का रिएक्शन
बाजार को शांत करने के लिए US Treasury Secretary स्कॉट बेसेंट ने बॉन्ड बायबैक प्रोग्राम को दोगुना करने का ऐलान किया है। अब सरकार हर ऑपरेशन में $2 बिलियन के बजाय $4 बिलियन के बॉन्ड खरीदेगी। हालांकि, एनालिस्ट्स का मानना है कि यह सिर्फ एक शॉर्ट-टर्म उपाय है और फिस्कल डेफिसिट जैसी बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं है।
भारतीय निवेशकों पर क्या होगा असर?
जब अमेरिकी बॉन्ड से मिलने वाला रिटर्न सुरक्षित और ज्यादा हो जाता है, तो विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) अपना पैसा उभरते बाजारों जैसे भारत से निकालकर अमेरिकी एसेट्स में लगाने लगते हैं। इसका सीधा असर भारतीय शेयर बाजार में बिकवाली और रुपये की कमजोरी के रूप में दिख सकता है। इसके अलावा, डॉलर में कर्ज लेने वाली भारतीय कंपनियों के लिए अपना लोन चुकाना और महंगा हो जाएगा। आगे आने वाले समय में निवेशकों की नजर अमेरिका के इन्फ्लेशन डेटा और फेडरल रिजर्व के फैसलों पर टिकी रहेगी।
