US Debt: अमेरिका का कर्ज **$40 ट्रिलियन** के पार, गहराते संकट से भारतीय बाजारों पर मंडराया खतरा

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AuthorAditya Rao|Published at:
US Debt: अमेरिका का कर्ज **$40 ट्रिलियन** के पार, गहराते संकट से भारतीय बाजारों पर मंडराया खतरा

अमेरिका का कुल कर्ज **$40 ट्रिलियन** के ऐतिहासिक स्तर को पार कर गया है, जबकि राजकोषीय घाटा जीडीपी का **6%** पहुंच गया है। बढ़ते रक्षा खर्च और खाड़ी देशों में तनाव के कारण ब्याज दरें ऊंची बनी हुई हैं, जिससे भारतीय निवेशकों के लिए कच्चे तेल की महंगाई और विदेशी निवेश में उतार-चढ़ाव का रिस्क बढ़ गया है।

दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, अमेरिका इस वक्त एक बड़े राजकोषीय संकट से जूझ रही है। सितंबर 2026 तक का डेटा देखें तो अमेरिका का कुल कर्ज $40 ट्रिलियन के आंकड़े को पार कर चुका है, और कर्ज-जीडीपी अनुपात (Debt-to-GDP ratio) लगभग 124% पर पहुंच गया है।

रक्षा खर्च और भू-राजनीतिक तनाव

इस वित्तीय बोझ के पीछे सबसे बड़ा कारण भारी-भरकम रक्षा बजट है। 2027 फाइनेंशियल ईयर के लिए प्रशासन ने $1.5 ट्रिलियन के रक्षा बजट की मांग की है। वहीं, ईरान के साथ चल रहे तनाव के कारण 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) में जारी हलचल ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को बाधित किया है। यह रास्ता कच्चे तेल की सप्लाई के लिए बेहद अहम है, और इसके बाधित होने से ग्लोबल स्तर पर एनर्जी प्राइसेस और महंगाई में आग लगी हुई है।

फेडरल रिजर्व और ब्याज दरों का दबाव

फेडरल रिजर्व के चेयर केविन वॉर्श की अगुवाई में अमेरिकी केंद्रीय बैंक महंगाई को 2% के लक्ष्य तक लाने के लिए 'हॉकिश' रुख अपनाए हुए है। ऊंची ब्याज दरों का सीधा असर सरकार के कर्ज चुकाने की लागत पर पड़ा है। अब स्थिति ऐसी हो गई है कि सरकार को बढ़े हुए ब्याज और रक्षा खर्चों को पूरा करने के लिए और ज्यादा कर्ज लेना पड़ रहा है, जो घाटे को और चौड़ा कर रहा है।

भारतीय निवेशकों के लिए चेतावनी

भारतीय बाजार के लिए यह स्थिति तीन बड़े जोखिम लेकर आई है:

  1. रुपये पर दबाव: अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची रहने से डॉलर मजबूत होता है, जिससे भारतीय रुपये (INR) की वैल्यू गिर सकती है। इससे उन कंपनियों को झटका लगेगा जो इंपोर्ट पर निर्भर हैं या जिन्होंने विदेशी मुद्रा में कर्ज ले रखा है।
  2. महंगाई और मुनाफा: कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत के इंपोर्ट बिल को बढ़ा रही हैं। इसका सीधा असर ट्रांसपोर्टेशन, मैन्युफैक्चरिंग और कंज्यूमर गुड्स सेक्टर की कंपनियों के मुनाफे पर पड़ सकता है।
  3. FPI फ्लो में अस्थिरता: जब अमेरिका में ट्रेजरी यील्ड्स आकर्षक होती हैं, तो ग्लोबल निवेशक इमर्जिंग मार्केट्स जैसे भारत से पैसा निकालकर वहां निवेश करने लगते हैं, जिससे भारतीय शेयर बाजार में वोलेटिलिटी बढ़ सकती है।
Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.