US और China के बीच ट्रेड तनाव को कम करने के लिए नवंबर में शिखर सम्मेलन तय किया गया है। सोमवार को दोनों देशों की ओर से एग्रीकल्चर और मेडिकल सेक्टर के लिए नई ट्रेड डील का ऐलान हो सकता है।
ट्रेड वॉर में नरमी के संकेत
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping के बीच वाशिंगटन में हुई हालिया मुलाकात के बाद, अब दोनों नेता नवंबर में चीन में फिर से मिलने वाले हैं। इसके बाद दिसंबर में Miami में होने वाली G20 समिट में भी दोनों देशों के बीच आगे की बातचीत तय है। यह साल 2026 के अंत तक एक ठोस कूटनीतिक कैलेंडर तैयार करता है।
'बोर्ड ऑफ ट्रेड' का नया फ्रेमवर्क
निवेशकों के लिए सबसे बड़ी खबर सोमवार को आने वाली है, जिसमें एक नए 'बोर्ड ऑफ ट्रेड' (Board of Trade) फ्रेमवर्क की घोषणा हो सकती है। इस पहल का मुख्य मकसद एग्रीकल्चर, मेडिकल डिवाइसेस और चीन के कंज्यूमर गुड्स को जियोपॉलिटिकल तनाव से दूर रखना है। इसे एक तरह का 'क्वॉरेंटाइन जोन' माना जा रहा है, ताकि दोनों देशों के बीच जरूरी व्यापार पर टैरिफ की मार न पड़े।
क्या अभी भी है खतरा?
हालांकि, यह कदम व्यापारिक स्थिरता की ओर है, लेकिन इसे विवादों का पूर्ण समाधान नहीं माना जा सकता। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) रेगुलेशन और ताइवान का मुद्दा अभी भी दोनों देशों के बीच बड़ी बाधा बने हुए हैं। इसके अलावा, इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन के लिए जरूरी 'रेयर-अर्थ मिनरल्स' (Rare-earth minerals) की सप्लाई को लेकर भी स्थिति साफ नहीं है।
भारतीय निवेशकों के लिए मायने
भारतीय मार्केट पर इसका असर ग्लोबल सेंटीमेंट और कमोडिटी सप्लाई चेन के जरिए पड़ेगा। ट्रेड एग्रीमेंट से ग्लोबल मार्केट में उतार-चढ़ाव कम हो सकता है, लेकिन जब तक बड़े स्ट्रक्चरल विवाद नहीं सुलझते, तब तक किसी भी अचानक पॉलिसी बदलाव का रिस्क बना हुआ है। निवेशकों को सलाह है कि वे ग्लोबल इंडेक्स पर नजर बनाए रखें और देखें कि क्या यह नई रणनीति लंबी अवधि तक टिक पाती है।
