US Treasury का 10-वर्षीय यील्ड **5.3%** तक पहुंच गया है, जो **2002** के बाद का उच्चतम स्तर है। यह सस्ता ग्लोबल पैसा मिलने के दौर के अंत का संकेत है, जिसका सीधा असर भारतीय शेयर बाजार, विदेशी निवेश (FII) और रुपये की चाल पर पड़ना तय है।
ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट में इस समय बड़ी हलचल मची हुई है। अक्टूबर 2026 की शुरुआत तक, 10-वर्षीय US Treasury यील्ड बढ़कर लगभग 5.31% हो गई है, जबकि 30-वर्षीय यील्ड करीब 5.7% पर ट्रेड कर रही है। यह आंकड़ा 2008 के बाद के उस दौर के अंत का संकेत है, जब ग्रोथ को सपोर्ट देने के लिए ब्याज दरें बहुत कम रखी गई थीं।
यील्ड्स में तेजी क्यों है?
बॉन्ड मार्केट में यह हलचल Federal Reserve की सख्त पॉलिसी का नतीजा है, जिसका मकसद महंगाई पर काबू पाना है। बाजार अब 'नॉर्मलाइजेशन' (Normalization) फेज की ओर बढ़ रहा है, जहां यील्ड्स सरकारी सपोर्ट के बजाय महंगाई और आर्थिक जोखिमों को दर्शा रहे हैं। अब सुरक्षित सरकारी बॉन्ड पर भी निवेशकों को बेहतर रिटर्न मिल रहा है, जिससे ग्लोबल कैपिटल का गणित पूरी तरह बदल गया है।
भारतीय बाजारों पर असर
भारतीय निवेशकों के लिए यह सिर्फ एक बाहरी खबर नहीं है। जब सुरक्षित अमेरिकी बॉन्ड में 5% से ज्यादा का रिटर्न मिलता है, तो ग्लोबल संस्थागत निवेशक भारतीय जैसे इमर्जिंग मार्केट से पैसा निकालकर अमेरिका शिफ्ट कर सकते हैं। इससे भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ता है क्योंकि डॉलर की मांग तेज होती है। इसके अलावा, जब अमेरिका में रिस्क-फ्री रिटर्न बढ़ता है, तो भारतीय शेयरों के वैल्यूएशन प्रीमियम में कमी आने की संभावना रहती है।
क्या हैं जोखिम और आगे की राह?
मौजूदा समय में अमेरिका पर कुल कर्ज GDP का 110% है। ऊंची ब्याज दरों का मतलब है कि अमेरिका को अब कर्ज के ब्याज चुकाने पर बहुत ज्यादा खर्च करना पड़ेगा। अगर ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो ग्लोबल स्तर पर कंपनियों की कमाई और शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।
निवेशकों के लिए अब सबसे महत्वपूर्ण Federal Reserve की अगली बैठकें होंगी। बाजार की नजर इस बात पर है कि दरें कब तक 'ऊंची' बनी रहेंगी। भारतीय निवेशकों को खासतौर पर FII फ्लो और रुपये की स्थिरता पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यही वे चैनल हैं जिनसे ग्लोबल बॉन्ड मार्केट की हलचल सबसे पहले भारत तक पहुंचती है।
