US 10-Year Yields: अमेरिका में AI के कर्ज और भारी घाटे का दबाव, 4.72% पर पहुंची बॉन्ड यील्ड

ECONOMY
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AuthorAditya Rao|Published at:
US 10-Year Yields: अमेरिका में AI के कर्ज और भारी घाटे का दबाव, 4.72% पर पहुंची बॉन्ड यील्ड

US Treasury यील्ड उछलकर **4.72%** के स्तर पर पहुंच गई है। इसके पीछे की बड़ी वजह **$2 ट्रिलियन** का फिजिकल डेफिसिट (राजकोषीय घाटा) और AI इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए टेक कंपनियों द्वारा लिया जा रहा भारी कर्ज है। हालांकि, भारतीय बाजार के लिए राहत की बात यह है कि डॉलर और बॉन्ड यील्ड का पुराना समीकरण बदल रहा है।

बाजार में हलचल की मुख्य वजह

US 10-साल की ट्रेजरी यील्ड का 4.72% तक पहुंचना वैश्विक निवेशकों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। यह उछाल केवल फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों के फैसलों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे दो बड़ी ताकतें काम कर रही हैं: अमेरिकी सरकार का बढ़ता राजकोषीय घाटा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) क्रांति को फंड करने के लिए कंपनियों द्वारा लिया जा रहा बेतहाशा कर्ज।

AI का बढ़ता कर्ज (AI Debt Expansion)

AI अब केवल एक सॉफ्टवेयर ट्रेंड नहीं रह गया है, बल्कि यह क्रेडिट मार्केट में कर्ज का एक बड़ा जरिया बन चुका है। बड़ी टेक कंपनियां, जिन्हें 'हाइपरस्केलर्स' कहा जाता है, उन्होंने AI क्षमता बनाने के लिए उपकरणों और इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी खर्च किया है। यह कैपिटल स्पेंडिंग काफी हद तक कर्ज के दम पर हो रही है। डेटा के अनुसार, साल 2026 में अब तक AI से संबंधित कर्ज जारी करने का आंकड़ा सैकड़ों अरब डॉलर तक पहुंच गया है। जब कंपनियां इतना अधिक कर्ज बाजार से उठाती हैं, तो वे पूंजी के लिए सीधे सरकार के साथ मुकाबला करती हैं। बाजार में सरकारी और निजी दोनों तरह के बॉन्ड की भारी सप्लाई से यील्ड पर दबाव बढ़ रहा है।

सरकारी घाटे का बोझ

कॉरपोरेट कर्ज के अलावा, अमेरिकी सरकार भी कठिन वित्तीय स्थिति का सामना कर रही है। मौजूदा फाइनेंशियल ईयर में वार्षिक संघीय घाटा $2 ट्रिलियन के पार निकल गया है और कुल राष्ट्रीय कर्ज $40 ट्रिलियन के रिकॉर्ड स्तर को छू चुका है। स्थिति यह है कि इस कर्ज पर दिया जाने वाला सालाना ब्याज $1 ट्रिलियन से अधिक हो गया है, जो देश के रक्षा बजट से भी ज्यादा है। ट्रेजरी विभाग को लगातार बॉन्ड जारी करने पड़ रहे हैं, जिससे निवेशकों में चिंता है कि क्या यह कर्ज स्तर लंबे समय तक टिकाऊ है।

भारत और निवेशकों के लिए संकेत

ऐतिहासिक रूप से, जब US यील्ड बढ़ती है, तो भारत जैसे उभरते बाजारों पर दबाव पड़ता है क्योंकि विदेशी निवेशक सुरक्षित डॉलर एसेट्स की ओर भागते हैं। लेकिन वर्तमान रुझान बताते हैं कि यह समीकरण बदल रहा है। इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि US डॉलर और ट्रेजरी यील्ड के बीच का पुराना संबंध कमजोर हो रहा है। यदि डॉलर बॉन्ड यील्ड के साथ नहीं बढ़ता है, तो भारतीय रुपये (Rupee) पर पिछली बार की तुलना में कम दबाव देखने को मिल सकता है।

भारतीय निवेशकों के लिए, US से आने वाला मैक्रो-इकोनॉमिक जोखिम उतना डरावना नहीं है जितना डर था। घरेलू कंपनियों के मजबूत अर्निंग्स और मानसून की अनुकूल स्थिति भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक कुशन का काम कर रही है। अब बाजार का फोकस वैश्विक हेडलाइंस के बजाय कंपनियों के प्रदर्शन और ग्रोथ पोटेंशियल पर शिफ्ट हो रहा है। आने वाले समय में US के महंगाई के आंकड़े और फेडरल रिजर्व का रुख यह तय करेंगे कि बॉन्ड यील्ड स्थिर होगी या और ऊपर जाएगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.