US Treasury Yields: 2007 के बाद सबसे बड़ा उछाल! भारतीय निवेशकों के लिए क्यों है चिंता की बात?

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AuthorAditya Rao|Published at:
US Treasury Yields: 2007 के बाद सबसे बड़ा उछाल! भारतीय निवेशकों के लिए क्यों है चिंता की बात?

अमेरिकी सरकार के 10-साल के बॉन्ड पर यील्ड (Yield) 4.683% के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, जो कि 2007 के वित्तीय संकट के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। इस बढ़त का भारतीय बाजारों और निवेशकों पर बड़ा असर पड़ सकता है।

अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में क्यों आई इतनी तेजी?

अमेरिकी सरकार ने हाल ही में 42 अरब डॉलर के 10-साल के बॉन्ड की नीलामी की, जिसमें यील्ड 4.683% पर बंद हुआ। यह दर 2007 के बाद सबसे ज़्यादा है। इस नीलामी में विदेशी खरीदारों का भी अच्छा सहयोग मिला, लेकिन बाज़ार की नज़रें अब लंबी अवधि के उधार की लागत पर बढ़ते दबाव पर हैं।

US 10-साल के बॉन्ड यील्ड को वैश्विक वित्त में 'रिस्क-फ्री' बेंचमार्क माना जाता है। जब यह दर बढ़ती है, तो भारत जैसे उभरते बाजारों में स्टॉक और बॉन्ड जैसे ज़्यादा जोखिम वाले एसेट्स की कीमतों पर असर पड़ता है। इस बढ़ोतरी के पीछे कई कारण हैं, जिनमें फेडरल रिजर्व के लक्ष्य से ज़्यादा महंगाई और अमेरिकी सरकार के बड़े बजट घाटे को पूरा करने के लिए उधार लेने की ज़रूरत शामिल है।

भारतीय निवेशकों पर क्या होगा असर?

अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी भारतीय निवेशकों के लिए कुछ मुश्किलें खड़ी कर सकती है। जब अमेरिकी सरकार सुरक्षित बॉन्ड पर लगभग 4.7% का रिटर्न दे रही है, तो यह पूंजी के लिए एक बड़ा आकर्षण बन जाता है। फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) को अमेरिकी ट्रेज़री बॉन्ड, भारतीय शेयर बाजार के जोखिम की तुलना में ज़्यादा आकर्षक लग सकते हैं। अगर ये निवेशक अपना पैसा अमेरिकी बॉन्ड में लगाते हैं, तो भारतीय शेयर बाजार में लिक्विडिटी (Liquidity) कम हो सकती है। इसके अलावा, डॉलर के मज़बूत होने से भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ सकता है, जिससे आयात महंगा हो सकता है।

आगे क्या?

भू-राजनीतिक तनावों के कारण कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें महंगाई के खतरे को बढ़ा रही हैं, जिससे यील्ड कम नहीं हो पा रहे हैं। इसके साथ ही, बैंक ऑफ जापान जैसी अन्य केंद्रीय बैंकों की नीतियां भी अमेरिकी ट्रेज़री की मांग को प्रभावित कर सकती हैं।

निवेशकों को यह देखना होगा कि ये ऊंचे यील्ड भारत में पूंजी प्रवाह को कैसे प्रभावित करते हैं। FIIs के दैनिक खरीदे-बिक्री के आंकड़े और 30-साल के अमेरिकी ट्रेज़री बॉन्ड की नीलामी पर नज़र रखनी होगी। अगर अमेरिकी यील्ड लंबे समय तक ऊंचे बने रहते हैं, तो यह भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति को भी प्रभावित कर सकता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.