UNCTAD ने चेतावनी दी है कि मौजूदा AI-ड्रिवेन मार्केट रैली साल 2000 के डॉट-कॉम बबल जैसी खतरनाक हो सकती है। अमेरिकी बाजार में हाई कंसंट्रेशन और महंगे वैल्यूएशन के कारण भारतीय बाजार पर भी असर पड़ने की आशंका है।
UNCTAD की ताजा रिपोर्ट ने ग्लोबल मार्केट में हड़कंप मचा दिया है। संस्था ने साफ कहा है कि मौजूदा AI-ड्रिवेन तेजी साल 2000 के डॉट-कॉम क्राइसिस और 2008 के फाइनेंशियल क्राइसिस जैसी ही खतरनाक स्थितियों को दर्शाती है। यदि कंपनियों की अर्निंग्स स्टॉक की कीमतों के बराबर नहीं बढ़ीं, तो बाजार में बड़ी गिरावट आ सकती है।\n\n### अमेरिकी बाजार में ओवर-वैल्यूएशन का खतरा\n\nरिपोर्ट में अमेरिकी स्टॉक्स के वैल्यूएशन पर चिंता जताई गई है। साइक्लिकली एडजस्टेड प्राइस-टू-अर्निंग्स रेश्यो (CAPE) फिलहाल 42 के स्तर पर है, जो ऐतिहासिक औसत 17 के मुकाबले दोगुना से भी ज्यादा है। हालात इतने नाजुक हैं कि केवल 10 बड़ी कंपनियां अमेरिकी मार्केट कैप का 37% हिस्सा संभाल रही हैं।\n\n### AI फाइनेंसिंग का 'सर्कुलर' जाल\n\nUNCTAD ने एक और चौंकाने वाली बात कही है: बड़ी टेक कंपनियां खुद ही AI रिसर्च को फंड कर रही हैं और फिर इसे क्लाउड कंप्यूटिंग फीस के जरिए अपना रेवेन्यू दिखा रही हैं। अगर AI सेवाओं की वास्तविक मांग नहीं बढ़ी, तो यह पूरा फंडिंग चक्र रुक सकता है, जिससे क्रेडिट मार्केट्स पर भारी दबाव बन सकता है।\n\n### भारत पर क्या असर पड़ेगा?\n\nभारतीय निवेशकों के लिए यह खबर सतर्क रहने वाली है। हालांकि भारत की 2026 के लिए GDP ग्रोथ प्रोजेक्शन 7.3% है, लेकिन ग्लोबल मार्केट में गिरावट आने पर विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकाल सकते हैं। इससे रुपये पर दबाव बढ़ सकता है और भारतीय कंपनियों के लिए कर्ज लेना महंगा हो सकता है। साथ ही, ग्लोबल लेवल पर टेक स्पेंडिंग कम होने से भारत के डेटा सेंटर और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की रफ्तार भी धीमी हो सकती है।\n\nनिवेशकों को अब ग्लोबल इंटरेस्ट रेट्स और बड़ी टेक कंपनियों के तिमाही नतीजों पर पैनी नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यही तय करेंगे कि यह रैली आगे बढ़ेगी या फिर मार्केट कूलिंग फेज में जाएगा।
