Give Grants की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की टॉप 200 कंपनियां कुल CSR खर्च के करीब आधे हिस्से के लिए जिम्मेदार हैं। हालांकि कंपनियां अब अपने सोशल इनिशिएटिव्स को प्रोफेशनल बना रही हैं, लेकिन सरकारी प्रोत्साहन के बावजूद सोशल स्टॉक एक्सचेंज (SSE) का इस्तेमाल अभी भी सुस्त है।
CSR में रीजनल कंसंट्रेशन और ESG रिस्क
CSR फंड का भौगोलिक वितरण काफी असमान है, जो अक्सर बड़े औद्योगिक दिग्गजों के ऑपरेशंस से जुड़ा होता है। उदाहरण के लिए, झारखंड में कुल CSR खर्च का 41% हिस्सा केवल Tata Steel का है, जबकि गुजरात में Reliance Industries की हिस्सेदारी 21% है। दिल्ली में ONGC, REC, NTPC और GAIL जैसी सार्वजनिक उपक्रमों का कुल स्थानीय खर्च में 30% योगदान है। निवेशकों के लिए, यह भौगोलिक एकाग्रता ESG (एनवायर्नमेंटल, सोशल, और गवर्नेंस) रणनीति का हिस्सा है जिसे मॉनिटर करना जरूरी है।
प्रोफेशनल मैनेजमेंट की ओर बढ़ता कदम
CSR अब केवल एक रेगुलेटरी कंप्लायंस नहीं, बल्कि एक स्पेशलाइज्ड कॉर्पोरेट फंक्शन बनता जा रहा है। टॉप 100 CSR खर्च करने वाली कंपनियों में से 44% ने अब अपने सोशल इनिशिएटिव्स के लिए समर्पित प्रमुख नियुक्त किए हैं। यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 85% कंपनियां अभी भी प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन के लिए इन-हाउस टीमों पर निर्भर हैं। इससे प्रोजेक्ट की सफलता की पूरी जिम्मेदारी कंपनी के मैनेजमेंट पर आ जाती है, जिसे शेयरधारकों को बारीकी से देखना चाहिए।
सोशल स्टॉक एक्सचेंज (SSE) का फासला
सरकार और कॉरपोरेट्स के बीच तालमेल की कमी साफ दिख रही है। मई 2026 में, मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स ने नियमों में बदलाव कर ZCZP (जीरो कूपन जीरो प्रिंसिपल) इंस्ट्रूमेंट्स को CSR का हिस्सा माना था (कुल खर्च का 10% कैप के साथ)। इसके बावजूद, केवल 3% कंपनियां ही इस प्लेटफॉर्म का उपयोग करने की योजना बना रही हैं, जबकि 60% कंपनियों ने निकट भविष्य में इसके प्रति कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है।
निवेशकों को यह समझना होगा कि CSR खर्च और शॉर्ट-टर्म शेयर रिटर्न के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। ये पहल ब्रांड वैल्यू और सस्टेनेबल बिजनेस के लिए लॉन्ग-टर्म निवेश के तौर पर देखी जाती है। भविष्य में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बड़ी कंपनियां अपने CSR फुटप्रिंट्स में विविधता लाती हैं और क्या SSE का इस्तेमाल वास्तव में बढ़ता है या नहीं।
