'Fragile Five' का लेबल अब उभरते बाजारों से शिफ्ट होकर G7 देशों जैसे US, UK और फ्रांस पर लग रहा है। इसका मुख्य कारण भारी कर्ज और सामाजिक अस्थिरता है। साल **2013** के विपरीत, आज का संकट करेंसी नहीं, बल्कि फिस्कल डेफिसिट (राजकोषीय घाटा) और बढ़ती ब्याज दरों का है, जो भारतीय निवेशकों के लिए ग्लोबल मार्केट के समीकरण बदल सकता है।
ग्लोबल फाइनेंशियल दुनिया में एक बड़ा बदलाव दिख रहा है। साल 2013 में 'Fragile Five' शब्द का इस्तेमाल उन उभरते देशों के लिए किया गया था जो करेंसी और कर्ज के संकट से जूझ रहे थे। लेकिन अब यही टैग दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं—फ्रांस, इटली, यूके, जर्मनी और अमेरिका—पर चस्पा किया जा रहा है, क्योंकि इनकी लंबी अवधि की वित्तीय स्थिति और सामाजिक एकता डगमगा रही है।
पुराना संकट बनाम आज की चुनौती
पुराने 'Fragile Five' (जैसे भारत, ब्राजील, तुर्की) की समस्या मुख्य रूप से करेंसी की अस्थिरता और कर्ज चुकाने के लिए विदेशी पूंजी पर निर्भरता थी। इसके उलट, आज के G7 देश सालों से जारी भारी सरकारी खर्च के परिणामों को झेल रहे हैं। कम ब्याज दरों के दौर से निकलकर अब महंगी उधारी के दौर में इनकी अर्थव्यवस्थाएं लड़खड़ा रही हैं।
कर्ज चुकाने का बढ़ता बोझ
जब ब्याज दरें कम थीं, तो देशों के लिए कर्ज संभालना आसान था। लेकिन अब ब्याज दरें बढ़ने से सरकारी बजट का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ 'इंटरेस्ट पेमेंट' में खर्च हो रहा है। इसके चलते पब्लिक इन्वेस्टमेंट और सोशल वेलफेयर के लिए पैसा कम पड़ रहा है। यही वजह है कि फ्रांस और यूके जैसे देशों में सामाजिक अशांति भी बढ़ रही है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
पारंपरिक रूप से अमेरिकी और यूरोपीय बाजारों को 'सेफ हेवन' माना जाता था। अगर वहां फिस्कल डेफिसिट और राजनीतिक अस्थिरता बनी रहती है, तो ग्लोबल निवेशकों का नजरिया बदल सकता है। यदि इन विकसित बाजारों से पैसा निकलता है, तो भारत जैसे उभरते बाजारों में निवेश आ सकता है, लेकिन इसके साथ ही शॉर्ट टर्म में बाजार में भारी 'वोलेटिलिटी' (उतार-चढ़ाव) भी देखने को मिल सकती है।
निवेशकों को क्या करना चाहिए?
भारतीय निवेशकों को इन देशों के सरकारी बॉन्ड यील्ड (Sovereign Bond Yields) पर नजर रखनी चाहिए। बढ़ती यील्ड का मतलब है कि मार्केट को इन देशों की आर्थिक स्थिरता पर भरोसा कम हो रहा है। इसके अलावा, क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की रिपोर्ट और सरकारी घाटे के आंकड़ों पर नजर रखना जरूरी है, क्योंकि ये सीधे तौर पर ग्लोबल लिक्विडिटी और डॉलर की मजबूती को प्रभावित करते हैं।
