RBI ने Tata Sons की उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें NBFC कैटेगरी से बाहर निकलने की मांग की गई थी। अब कंपनी पर पब्लिक लिस्टिंग का दबाव बढ़ गया है, जिसे टालने के लिए Tata Trusts बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव की तैयारी में है।
RBI का सख्त फरमान
Tata Sons के सामने एक बड़ी रेगुलेटरी चुनौती खड़ी हो गई है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने कंपनी को 'अपर लेयर' नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC-UL) के रूप में वर्गीकृत किया है। 11 सितंबर, 2026 को RBI द्वारा कंपनी की 'कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी' (CIC) रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की अर्जी खारिज किए जाने के बाद से ही लिस्टिंग की प्रक्रिया को लेकर दबाव काफी बढ़ गया है।
Tata Trusts का नया प्लान
ग्रुप के 66% हिस्सेदारी रखने वाले Tata Trusts ने इस अनिवार्य लिस्टिंग से बचने के लिए एक बड़ा रिस्ट्रक्चरिंग प्लान तैयार किया है। इस रणनीति के तहत दो अनलिस्टेड कंपनियां—Tata Electronics Systems और Tata Consulting Engineers—को Tata Sons में मर्ज करने का प्रस्ताव है। इसका मुख्य उद्देश्य कंपनी के एसेट प्रोफाइल में बदलाव करना है ताकि वह NBFC-UL कैटेगरी की शर्तों से बाहर निकल सके।
अंदरूनी कलह और अनिश्चितता
यह प्रस्ताव अब ग्रुप के लिए ही गले की हड्डी बन गया है। जहां एक तरफ बोर्ड के सदस्य लिस्टिंग के पक्ष में थे, वहीं दूसरी ओर नोएल टाटा के नेतृत्व में Tata Trusts अब भी किसी भी तरह कंपनी को अनलिस्टेड रखने की कोशिशों में जुटा है। इस खींचतान के कारण ट्रस्टीज़ के बीच सार्वजनिक असहमति देखने को मिली है। फिलहाल, बोर्ड इस मर्जर प्रस्ताव की कानूनी वैधता जांचने के लिए सलाह ले रहा है।
निवेशकों पर असर
अगर कंपनी लिस्ट होती है, तो इसकी फाइनेंशियल पारदर्शिता बढ़ेगी, जो Air India जैसी सब्सिडियरी कंपनियों पर बढ़ते वित्तीय दबाव को देखते हुए अहम हो सकता है। फिलहाल ग्रुप अपनी फंडिंग डिविडेंड और मैच्योर बिजनेस में हिस्सेदारी बेचकर करता है। निवेशकों के लिए अब पूरी नजर इस बात पर है कि क्या ग्रुप बिना IPO लाए रेगुलेटरी नियमों को पूरा कर पाएगा या उसे अंततः बाजार में आना ही होगा।
