Tata Sons ने N. Chandrasekaran के तीसरे कार्यकाल को लेकर उठ रहे सवालों को शांत करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट के दो पूर्व जजों की कानूनी राय ली है, जिससे मैनेजमेंट में कंटिन्यूटी (continuity) बनी रहेगी और TCS व Tata Motors जैसे बड़े शेयरों के निवेशकों को राहत मिलेगी।
कानूनी राय और बोर्ड का विवाद
N. Chandrasekaran के तीसरे कार्यकाल की वैधता को लेकर आंतरिक मतभेद सामने आए थे, जिसे सुलझाने के लिए Tata Sons ने पूर्व सुप्रीम कोर्ट जस्टिस B.N. Srikrishna और Uday U. Lalit की कानूनी राय मांगी है। मामला कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के Article 121 से जुड़ा है, जो चेयरमैन की नियुक्ति के लिए ट्रस्ट द्वारा नामित निदेशकों की सहमति अनिवार्य करता है।
17 सितंबर, 2026 को बोर्ड मीटिंग के दौरान वोटिंग को लेकर डेडलॉक की स्थिति बन गई थी। हालांकि, जस्टिस Uday U. Lalit ने स्पष्ट किया कि बोर्ड द्वारा इस्तेमाल किया गया कास्टिंग वोट डेडलॉक तोड़ने के लिए पूरी तरह वैध था। नोएल एन. टाटा के विरोध या अनुपस्थिति के बाद भी, पांच सदस्यों की मौजूदगी में प्रक्रिया नियमों के दायरे में रही।
डायरेक्टर की जिम्मेदारी और निवेश पर असर
जस्टिस B.N. Srikrishna ने एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु रखा है—निदेशकों की 'फिडुशियरी ड्यूटी' (fiduciary duty)। उनका तर्क है कि कंपनी एक्ट के तहत डायरेक्टर का प्राथमिक कर्तव्य कंपनी के हित में काम करना है, न कि केवल नामिती संस्था (nominating entity) के अनुबंधों को मानना। इसी तर्क के आधार पर वेणु श्रीनिवासन जैसे बोर्ड सदस्यों के वोट को सही ठहराया गया है।
टाटा ग्रुप की सभी लिस्टेड कंपनियां जैसे TCS, Tata Steel, Tata Motors और Titan सीधे तौर पर होल्डिंग कंपनी की रणनीतियों से जुड़ी हैं। इस कानूनी स्पष्टता से मैनेजमेंट में स्थिरता का संकेत जाता है, जो लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टर्स के लिए एक बड़ा पॉजिटिव ट्रिगर है। बाजार की नजरें अब इसी गवर्नेंस स्टेबिलिटी पर टिकी हैं ताकि भविष्य के बड़े फैसलों में कोई रुकावट न आए।
