अर्थशास्त्री 'Swarnmudras' के विचार पर काम कर रहे हैं, जो पॉलीमर में पैक सोने के नोट होंगे। इसका मकसद घरों में पड़े सोने को लिक्विड एसेट बनाना है, हालांकि Coinage Act के तहत इसके सामने बड़ी कानूनी चुनौतियां हैं।
भारत के घरों में करीब 25,000 टन सोना जमा है। सरकार पहले भी गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम (GMS) जैसी योजनाएं लाई है, लेकिन लोग अपना गहना पिघलाने या उसे सौंपने को तैयार नहीं होते। अब 'Swarnmudras' का कॉन्सेप्ट आया है, जिसमें 24 कैरेट सोने की छोटी मात्रा को पॉलीमर फिल्म में सील करके 'नोट' की तरह इस्तेमाल करने का प्रस्ताव है।
यह कैसे काम करेगा?
इसका उद्देश्य यह है कि परिवार बिना अपना सोना खोए, उसे रोजमर्रा के छोटे लेनदेन में इस्तेमाल कर सकें। अगर यह सफल होता है, तो सोना सिर्फ एक तिजोरी में बंद एसेट न रहकर, रुपये की अस्थिरता के समय एक सुरक्षित करेंसी की तरह काम कर सकता है।
कानून और रेगुलेशन की दीवार
इस राह में सबसे बड़ी बाधा Coinage Act, 2011 की धारा 14 है, जो किसी भी धातु के सिक्के या नोट को लीगल टेंडर के रूप में जारी करने पर रोक लगाती है। इसके अलावा, RBI कभी भी ऐसी समानांतर करेंसी को अनुमति नहीं देगा जो उसकी मौद्रिक नीति (monetary policy) को चुनौती दे।
इतिहास से सबक
1968 का 'गोल्ड कंट्रोल एक्ट' एक बड़ा उदाहरण है कि सोने पर सख्ती से क्या होता है। उस समय पाबंदियों के कारण तस्करी बढ़ गई थी और बाजार इनफॉर्मल हो गया था। समर्थक मानते हैं कि 'Swarnmudras' जैसे पारदर्शी माध्यम से इस अनौपचारिक बाजार को कम किया जा सकता है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि छोटे मूल्य के सोने की शुद्धता की जांच और counterfeiting (जाली नोट) का जोखिम बहुत ज्यादा है। अगर बाजार और आम लोग इसे स्वीकार नहीं करते हैं, तो इसकी लिक्विडिटी शून्य हो जाएगी। इस विषय पर सरकार या RBI के किसी भी रुख पर नजर रखना जरूरी है।
