सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि 'इंडस्ट्री' को परिभाषित करने वाला 1978 का 'ट्रिपल टेस्ट' नियम अब Industrial Relations Code, 2020 पर अपने आप लागू नहीं होगा। इस फैसले से लेबर कानूनों में बड़े बदलाव की शुरुआत हुई है।
कानून का नया अध्याय
20 अगस्त, 2026 को सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक बेंच ने 'स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश बनाम जय बीर सिंह' मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने साफ किया कि 'बैंगलोर वाटर सप्लाई' जजमेंट के तहत आया 1978 का 'ट्रिपल टेस्ट' अब सीधे तौर पर नए लेबर कोड पर लागू नहीं माना जाएगा।
बिजनेस पर क्या होगा असर?
दशकों से 'ट्रिपल टेस्ट' के जरिए इंडस्ट्री की जो व्यापक परिभाषा तय थी, उसने प्राइवेट और चैरिटेबल संस्थाओं को भी लेबर कानूनों के दायरे में ला खड़ा किया था। अब कोर्ट ने कहा है कि नए कानून को उसके अपने शब्दों और लेबर कोड के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।
यह फैसला अब दो-तरफा कानूनी व्यवस्था तैयार करेगा:
- पुराने विवाद: 1947 के Industrial Disputes Act के तहत लंबित मामले अभी भी पुराने 'ट्रिपल टेस्ट' से ही सुलझाए जाएंगे।
- नए विवाद: Industrial Relations Code, 2020 के तहत आने वाले मामलों के लिए कोर्ट अब नए सिरे से 'इंडस्ट्री' की परिभाषा तय करेगा।
निवेशकों के लिए क्यों है अहम?
कॉरपोरेट जगत के लिए यह बदलाव काफी मायने रखता है। यदि 'इंडस्ट्री' की परिभाषा बदलती है, तो कंपनियों की कंप्लायंस कॉस्ट और यूनियन बनाने के अधिकारों पर सीधा असर पड़ेगा। फिलहाल, कंपनियां और इन्वेस्टर्स इस बात पर नजर रखे हुए हैं कि लोअर कोर्ट्स और लेबर ट्रिब्यूनल्स इस नए कानून की व्याख्या कैसे करते हैं। आने वाले समय में सरकार की गाइडलाइंस यह तय करेंगी कि लेबर-मैनेजमेंट के रिश्ते भविष्य में किस दिशा में जाएंगे।
