Supreme Court ने साफ कर दिया है कि रोजमर्रा के खर्चों के लिए मिलने वाली बिजली सब्सिडी अब 'टैक्सेबल रेवेन्यू' मानी जाएगी। यह फैसला उन मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए बड़ा झटका है, जो अब तक इसे टैक्स-फ्री 'कैपिटल रिसिप्ट' मानकर टैक्स बचा रही थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि सरकार से मिलने वाली वो बिजली सब्सिडी, जो कंपनी के दैनिक ऑपरेशंस (Daily Operations) के खर्चों को कम करने के लिए दी जाती है, वह 'रेवेन्यू रिसिप्ट' मानी जाएगी। 7 अक्टूबर, 2026 को जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने यह फैसला सुनाया।
कोर्ट का 'पर्पस टेस्ट' और टैक्स का गणित
अदालत ने 'पर्पस टेस्ट' के जरिए यह साफ किया कि सब्सिडी का मकसद चाहे कुछ भी हो, लेकिन अगर उसका इस्तेमाल बिजली बिल कम करने के लिए हो रहा है, तो वह सीधे तौर पर बिजनेस के ऑपरेटिंग खर्चों में कटौती है। इनकम टैक्स एक्ट 1961 के तहत अब ऐसी सब्सिडी पर टैक्स देना अनिवार्य होगा।
निवेशकों के लिए क्यों है यह जरूरी?
शेयर बाजार के निवेशकों के लिए 'कैपिटल रिसिप्ट' और 'रेवेन्यू रिसिप्ट' के बीच का अंतर समझना बहुत जरूरी है।
- कैपिटल रिसिप्ट: नई फैक्ट्री या मशीनरी के लिए मिली रकम, जिस पर अक्सर टैक्स में छूट मिलती है।
- रेवेन्यू रिसिप्ट: बिजली, मजदूरी या कच्चे माल के लिए मिली रकम, जो रेगुलर इनकम मानी जाती है और जिस पर कंपनी को पूरा कॉर्पोरेट टैक्स देना पड़ता है।
अब तक पावर-इंटेंसिव सेक्टर की कई कंपनियां इन सब्सिडी को 'कैपिटल रिसिप्ट' बताकर अपना टैक्स बचा रही थीं और मुनाफा ज्यादा दिखा रही थीं। इस फैसले के बाद, इन कंपनियों का टैक्स आउटगो बढ़ सकता है, जिसका सीधा असर उनके नेट प्रॉफिट पर देखने को मिलेगा।
आगे क्या होगा?
यह मामला Mepco Industries Ltd. बनाम इनकम टैक्स कमिश्नर के विवाद से जुड़ा है। अब इनकम टैक्स विभाग उन कंपनियों की जांच तेज कर सकता है जिन्होंने इस सब्सिडी को टैक्स-फ्री दिखाया है। निवेशकों को सलाह है कि वे कंपनियों की अगली तिमाही रिपोर्ट में 'Notes to Accounts' जरूर देखें, जहां मैनेजमेंट इस टैक्स बदलाव के असर की जानकारी दे सकता है।
