सुप्रीम कोर्ट ने 2021 के उस मेमोरेंडम को रद्द कर दिया है, जिसके तहत इंफ्रा प्रोजेक्ट्स को बिना एनवायरनमेंट क्लियरेंस के काम शुरू करने की छूट थी। भले ही **₹20,000 करोड़** के मौजूदा प्रोजेक्ट्स को राहत मिली है, लेकिन भविष्य के लिए नियम सख्त हो गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण नियमों के पालन को लेकर एक ऐतिहासिक और सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अब किसी भी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को 'पोस्ट-फैक्टो' यानी निर्माण के बाद अनुमति लेने की सुविधा नहीं मिलेगी। कोर्ट ने 2021 के उस सरकारी मेमोरेंडम को खारिज कर दिया है, जो नियमों में ढील देता था।
₹20,000 करोड़ के प्रोजेक्ट्स पर क्या असर?
इस फैसले से अस्पताल और एयरपोर्ट विस्तार जैसे उन प्रोजेक्ट्स को तुरंत राहत मिली है जो कानूनी पेच में फंसे थे, जिनकी कुल वैल्यू करीब ₹20,000 करोड़ आंकी गई है। ये प्रोजेक्ट्स अब बिना किसी रुकावट के चलते रहेंगे। हालांकि, पूरे इंफ्रा और इंडस्ट्रियल सेक्टर के लिए यह एक बड़ा संकेत है कि अब 'पहले बनाओ, बाद में मंजूरी लो' वाली नीति पूरी तरह खत्म हो गई है।
निवेशकों के लिए नई चुनौतियां
अब डेवलपर्स को निर्माण शुरू करने से पहले ही एनवायरनमेंट क्लियरेंस की सारी औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी। इसका सीधा असर प्रोजेक्ट्स की टाइमलाइन पर पड़ेगा। निर्माण, पावर और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की कंपनियों के लिए प्रोजेक्ट शुरू करने में अब ज्यादा समय लग सकता है।
बैंकों के लिए 'ड्यू डिलिजेंस' का नया दौर
इस फैसले का असर बैंकों और फाइनेंशियल संस्थानों पर भी दिखेगा। अब लेंडर्स को लोन देने से पहले प्रोजेक्ट्स के पर्यावरणीय स्टेटस की बारीकी से जांच करनी होगी। अगर कोई प्रोजेक्ट अधूरा या नियमों के खिलाफ पाया जाता है, तो उसे फंड जुटाने में मुश्किल हो सकती है।
आने वाले समय में, निवेशकों को उन कंपनियों पर कड़ी नजर रखनी चाहिए जो अपनी प्रोजेक्ट डेडलाइन के लिए सरकारी मंजूरियों पर निर्भर रहती हैं। कंपनियों का मैनेजमेंट अब पर्यावरण अनुपालन (Compliance) पर खर्च बढ़ा सकता है, जिसका असर मार्जिन पर भी देखने को मिल सकता है।
