सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी (Prohibition) के खिलाफ कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने माना है कि पूर्ण शराबबंदी से समस्या सुलझने के बजाय अवैध कारोबार बढ़ता है और सरकारी राजस्व का भारी नुकसान होता है। महाराष्ट्र के मामले में आए इस फैसले से शराब कंपनियों के लिए भविष्य में पॉलिसी संबंधी अनिश्चितता कम हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य-स्तरीय शराबबंदी की नीतियों पर बड़ा सवाल खड़ा करते हुए कहा है कि पूर्ण प्रतिबंध (Blanket Ban) पूरी तरह से विफल रहे हैं। महाराष्ट्र के मामले में सुनवाई करते हुए कोर्ट ने राज्य के कुछ प्रतिबंधात्मक नियमों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने तर्क दिया कि इस तरह की पाबंदियों से अवैध शराब का धंधा फलने-फूलने लगता है, पुलिस करप्शन बढ़ता है और राज्य को मिलने वाले राजस्व में भारी गिरावट आती है।
शराब सेक्टर के निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
भारत में शराब का कारोबार पूरी तरह से राज्य सरकारों के अधीन है। United Spirits, United Breweries और Radico Khaitan जैसी बड़ी कंपनियां अक्सर राज्य-स्तरीय पॉलिसी बदलावों के कारण दबाव में रहती हैं। बिहार और गुजरात जैसे राज्यों में शराबबंदी के कारण कंपनियों के रेवेन्यू पर बुरा असर पड़ा है। अब सुप्रीम कोर्ट का यह रुख एक कानूनी आधार (Legal Framework) तैयार कर सकता है, जो भविष्य में अन्य राज्यों को पूर्ण शराबबंदी लागू करने से रोक सकता है।
कोर्ट का डेटा और केस का बोझ
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नैतिक आधार पर बनाई गई ये नीतियां सामाजिक समस्याओं को सुलझाने में नाकाम रही हैं। बिहार के 2016 एक्साइज एक्ट का हवाला देते हुए कोर्ट ने बताया कि वहां 3 लाख से ज्यादा केस पेंडिंग हैं, जो कोर्ट पर बोझ बढ़ा रहे हैं।
हालांकि निवेशकों को यह समझना होगा कि अभी भी यह राज्य सरकार का अधिकार क्षेत्र है कि वे शराब पर एक्साइज ड्यूटी, टैक्स और वितरण के नियम कैसे तय करती हैं। लेकिन इस न्यायिक संकेत से यह उम्मीद जगी है कि आगे चलकर 'पूर्ण प्रतिबंध' के बजाय 'Managed Regulation' की ओर झुकाव बढ़ेगा, जो फॉर्मल और टैक्स देने वाली कंपनियों के लिए बेहतर कारोबारी माहौल बना सकता है।
