Persian Gulf में बढ़ते तनाव ने ग्लोबल स्टील कंपनियों की चिंता बढ़ा दी है। अब ये कंपनियां 'ग्रीन हाइड्रोजन' की जगह एनर्जी सिक्योरिटी को प्राथमिकता दे रही हैं। भारत में Jindal Steel जैसे दिग्गज कोल गैसीफिकेशन अपना रहे हैं, ताकि ऊर्जा की अस्थिर कीमतों से बचा जा सके।
ऊर्जा संकट और बदलती प्राथमिकताएं
Persian Gulf में तनाव के कारण शिपिंग और सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। 2026 की शुरुआत से ही स्टील उत्पादकों पर दबाव बढ़ गया है। अब कंपनियाँ अपनी डीकार्बोनाइजेशन (Decarbonization) योजनाओं को धीमा कर रही हैं, ताकि तत्काल ऊर्जा संकट और लॉजिस्टिक रुकावटों से निपटा जा सके।
भारत में क्या है रणनीति?
भारतीय बाजार में बड़ी कंपनियां जैसे Jindal Steel अब कोल गैसीफिकेशन पर दांव लगा रही हैं। यह तकनीक उन्हें कोकिंग कोल और नेचुरल गैस की कीमतों में होने वाले उछाल से एक सुरक्षा कवच देती है। भारत सरकार की ₹37,500 करोड़ की कोल गैसीफिकेशन योजना 2030 तक देश को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह रणनीति शेयरधारकों के लिए मुनाफे के मार्जिन (Profit Margins) को सुरक्षित रखने में मदद कर रही है।
ग्लोबल मार्केट की चुनौतियां
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थिति अधिक गंभीर है। Meranti Green Steel जैसे कई प्रोजेक्ट्स फंड और सप्लाई चेन की समस्याओं के चलते ठंडे बस्ते में चले गए हैं। 2026 के मध्य के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर के करीब 50% प्रस्तावित ग्रीन स्टील प्रोजेक्ट्स में देरी हो रही है। इसकी मुख्य वजहें ऊंची ब्याज दरें और चुनौतीपूर्ण भू-राजनीतिक माहौल हैं।
निवेशकों के लिए चेतावनी
भले ही कोल गैसीफिकेशन से उत्पादन बना रहे, लेकिन यह एक 'कार्बन-इंटेंसिव' प्रक्रिया है। भविष्य में सख्त होते पर्यावरण मानकों के बीच यह कंपनियों के लॉन्ग-टर्म टारगेट के लिए रिस्क पैदा कर सकता है। निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां अपनी आज की ऊर्जा सुरक्षा और कल के उत्सर्जन मानकों के बीच कैसे संतुलन बिठाती हैं।
